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PM SHRI को लेकर रस्साकशी: केरल विचारधारा और बुनियादी ढांचे के बीच क्यों फंसा?

केरल सरकार को PM SHRI पर अपना रुख बदलने का कारण स्पष्ट करना चाहिए: पिनाराई

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 18 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
PM SHRI को लेकर रस्साकशी: केरल विचारधारा और बुनियादी ढांचे के बीच क्यों फंसा?
PM SHRI को लेकर रस्साकशी: केरल विचारधारा और बुनियादी ढांचे के बीच क्यों फंसा?

जैसे-जैसे राज्य सरकार केंद्र की स्कूल योजना को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, रुख बदलने, वित्तीय दबाव और केरल में सार्वजनिक शिक्षा के भविष्य को लेकर एक तीखा राजनीतिक विवाद छिड़ गया है।

तिरुवनंतपुरम में सचिवालय के गलियारों में एक जानी-पहचानी गूंज सुनाई दे रही है: PM SHRI (प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया) योजना को लेकर राजनीतिक बयानबाजी। महीनों तक, LDF सरकार केंद्र की इस प्रमुख पहल के खिलाफ मजबूती से खड़ी रही और इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के लिए एक 'ट्रोजन हॉर्स' (छल) के रूप में देखती रही। हालांकि, एक नाटकीय यू-टर्न ने पर्यवेक्षकों को सत्ताधारी दल और विपक्ष दोनों की निरंतरता पर सवाल उठाने पर मजबूर कर दिया है, क्योंकि राज्य ने अब समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं।

इस बदलाव का मुख्य कारण वित्तीय संघवाद का दबाव है। केंद्र द्वारा समग्र शिक्षा अभियान के 1,158 करोड़ रुपये से अधिक की राशि रोके जाने के कारण, राज्य का शिक्षा क्षेत्र—जिसमें लगभग 40 लाख छात्र शामिल हैं—गंभीर संकट का सामना कर रहा था। यूनिफॉर्म, पाठ्यपुस्तकें और शिक्षकों के वेतन पर संकट मंडरा रहा था। हालांकि राज्य सरकार ने शुरू में विरोध किया था, लेकिन शिक्षा मंत्री वी. शिवनकुट्टी ने अंततः इस निर्णय को वैचारिक समर्पण के बजाय उन निधियों को सुरक्षित करने की एक रणनीतिक आवश्यकता के रूप में पेश किया, जो "राज्य का अधिकार हैं।"

पिनाराई का पलटवार

विपक्ष के नेता पिनाराई विजयन ने तुरंत पासा पलट दिया है। मौजूदा सरकार पर LDF के सैद्धांतिक विरोध को छोड़ने का आरोप लगाते हुए, उनका कहना है कि MoU पर हस्ताक्षर करना पूर्ण कार्यान्वयन के लिए कोई बाध्यकारी प्रतिबद्धता नहीं है। पंजाब का उदाहरण देते हुए—जो 2023 में इस योजना से बाहर हो गया था—उनका जोर है कि केरल के पास पीछे हटने के लिए कानूनी और राजनीतिक गुंजाइश है। उनकी आलोचना तीखी है: यदि LDF बिना पूरी योजना लागू किए फंड के लिए बातचीत कर सकती थी, तो वर्तमान सरकार ने अलग रास्ता क्यों चुना? उन्होंने प्रशासन को स्पष्ट रूप से चुनौती दी है कि वे बताएं कि क्या केंद्र सरकार का कोई सीधा निर्देश था जिसने इस बदलाव को मजबूर किया।

बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है

यह गतिरोध केवल स्कूल के बुनियादी ढांचे के बारे में नहीं है; यह केरल के शिक्षा मॉडल की आत्मा के लिए लड़ाई है। केंद्रीय अनुदान को PM SHRI योजना को अपनाने से जोड़कर, केंद्र ने प्रभावी रूप से वित्तीय लाभ का उपयोग उस राज्य पर अनुपालन के लिए दबाव डालने के लिए किया है, जिसने लंबे समय से NEP की केंद्रीकरण प्रवृत्तियों का विरोध किया है। LDF के लिए, यह कदम एक नाजुक संतुलन है। उन्हें राज्य की विशाल सार्वजनिक शिक्षा मशीनरी को चलाने के लिए फंड सुरक्षित करना है, साथ ही CPI जैसे सहयोगियों को भी शांत करना है, जो NEP के "भगवाकरण" और निगमीकरण के जोखिमों को लेकर बेहद आशंकित हैं। योजना के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए एक उप-समिति का गठन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सरकार समय खरीदने और वैचारिक स्वायत्तता का दिखावा बनाए रखने की कोशिश कर रही है।

एक नाजुक समझौता

सत्ताधारी गठबंधन के भीतर आंतरिक घर्षण स्पष्ट है। CPI का इस परियोजना को स्थगित रखने का आग्रह—जिससे सरकार को MoU को 'फ्रीज' के रूप में मानने के लिए मजबूर होना पड़ा—गहरे अविश्वास को दर्शाता है। हालांकि सरकार का दावा है कि वह राज्य के पाठ्यक्रम को हस्तक्षेप से बचाएगी, लेकिन आलोचकों का तर्क है कि एक बार जब केंद्रीय योजना संस्थागत हो जाएगी, तो यह 'सॉफ्ट' कार्यान्वयन अनिवार्य रूप से कठोर हो जाएगा। जैसे-जैसे राज्य आगे बढ़ रहा है, असली परीक्षा कागजों पर हस्ताक्षर करना नहीं, बल्कि यह होगी कि क्या केरल अपनी कक्षाओं को उस राष्ट्रीय नीति ढांचे से बचा पाता है जिसकी वह वर्षों से आलोचना करता रहा है।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।