प्रशांत महासागर की बढ़ती तपिश: भारत के मानसून पर अल नीनो का क्या होगा असर?
IMD का अनुमान: मानसून के दौरान और मजबूत होगा अल नीनो
जैसे-जैसे मानसून भारतीय उपमहाद्वीप में आगे बढ़ रहा है, IMD ने चेतावनी दी है कि प्रशांत महासागर में बदलती समुद्री धाराएं हमारे कृषि प्रधान क्षेत्रों की सहनशक्ति की परीक्षा ले सकती हैं।
भारतीय मानसून का वार्षिक चक्र शुरू हो चुका है, लेकिन इस साल यह एक अलग तरह की गर्मी के साये में आया है। हालांकि बारिश ने आधिकारिक तौर पर केरल में दस्तक दे दी है, लेकिन भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने एक गंभीर अपडेट जारी किया है: अल नीनो की स्थिति न केवल बनी हुई है, बल्कि इसके पूरे सीजन के दौरान और तेज होने की आशंका है। एक ऐसे देश के लिए जहां मानसून कृषि अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है, ये ताजा पूर्वानुमान घबराने के बजाय तत्काल और रणनीतिक तैयारी का संकेत हैं।
बदलाव का विज्ञान
IMD का आकलन, जो उसके अत्याधुनिक 'मानसून मिशन कपल्ड फोरकास्ट सिस्टम' (MMCFS) पर आधारित है, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के गर्म होने की ओर इशारा करता है। ऐतिहासिक रूप से, ये स्थितियां हमारी बारिश के स्वास्थ्य के विपरीत रही हैं। जब प्रशांत महासागर गर्म होता है, तो नमी से भरी हवाएं जो आमतौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की ओर आती हैं, वे कमजोर पड़ सकती हैं, जिससे बारिश का वितरण असमान हो सकता है या लंबे समय तक सूखा पड़ सकता है। सीजन शुरू होने के साथ ही, IMD का ध्यान अब इन उतार-चढ़ावों पर नजर रखने पर है ताकि नीति निर्माताओं और किसानों को समय-समय पर सटीक जानकारी दी जा सके।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
इसका सीधा संबंध खाद्य और जल सुरक्षा से है। हम एक ऐसी स्थिति देख रहे हैं जहां कृषि मंत्रालय द्वारा पहचाने गए 197 अत्यधिक संवेदनशील जिलों में खरीफ की बुवाई के महत्वपूर्ण समय पर नमी की कमी हो सकती है। सामान्य मानसून चक्र से एक मजबूत अल नीनो प्रभावित चक्र में बदलाव केवल एक मौसमी घटना नहीं है; यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है। यदि बारिश कम होती है, तो इसका असर गांवों के अनाज भंडार से लेकर शहरों की खुदरा कीमतों तक महसूस किया जाएगा। इसलिए, सरकार का लक्ष्य संकट प्रबंधन के बजाय सक्रिय अनुकूलन की ओर बढ़ना है।
घबराहट से तैयारी की ओर
इन जोखिमों को कम करने की योजना पहले से ही अमल में है। IMD स्थानीय प्रशासन से तत्काल आपातकालीन उपायों को सक्रिय करने का आग्रह कर रहा है। यह मौसम को रोकने के बारे में नहीं, बल्कि उसके अनुसार खेती के तरीके को बदलने के बारे में है। इस रणनीति में सूखा-सहनशील फसलों की किस्मों की ओर बढ़ना और पानी की अधिक खपत वाली खेती से दूरी बनाना शामिल है। बाजरा और दालों को बढ़ावा देना, जो स्वाभाविक रूप से अधिक लचीले होते हैं, इस रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा है। इसके अतिरिक्त, विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन और वास्तविक समय पर आधारित कृषि-परामर्श सेवाओं पर जोर दिया जा रहा है ताकि जोखिम वाले क्षेत्रों के किसान अपने खेतों के सूखने से पहले सही निर्णय ले सकें।
बड़ी तस्वीर
इस साल का मानसून हमें याद दिलाता है कि भारत की जलवायु वैश्विक समुद्री पैटर्न से तेजी से जुड़ी हुई है। हालांकि हम अक्सर मानसून को एक स्थानीय घटना मानते हैं, लेकिन यह एक जटिल और परस्पर जुड़ी वैश्विक प्रणाली का हिस्सा है। इन घटनाओं की पुनरावृत्ति यह बताती है कि हमारी कृषि प्रणालियों को स्थायी रूप से विकसित होने की आवश्यकता है, ताकि हम एकसमान बारिश पर निर्भर रहने के बजाय 'क्लाइमेट-स्मार्ट' खेती के मॉडल की ओर बढ़ सकें। जैसे-जैसे हम आज का मौसम ट्रैक करते हैं, हमारा असली ध्यान दीर्घकालिक योजना पर होना चाहिए जो अनिश्चित जलवायु के बीच हमारी खाद्य आपूर्ति को सुरक्षित रख सके।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।