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कौटिल्य नगर के नीचे की जमीन: अतिक्रमण की विरासत और अनसुलझे सवाल

लालू यादव के कौटिल्य नगर वाली जमीन की क्यों नहीं हुई जांच! क्या NDA सरकार में मंत्री के वादे की कीमत नहीं?

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 4 जुलाई 2026· 3 मिनट पढ़ें
कौटिल्य नगर के नीचे की जमीन: अतिक्रमण की विरासत और अनसुलझे सवाल
कौटिल्य नगर के नीचे की जमीन: अतिक्रमण की विरासत और अनसुलझे सवाल

पटना की बेशकीमती जमीन पर लंबे समय से चला आ रहा विवाद यह उजागर करता है कि कैसे पशु चिकित्सा विज्ञान के लिए आरक्षित सार्वजनिक भूमि राजनीतिक और प्रशासनिक दलदल में फंस गई।

कौटिल्य नगर की कहानी सिर्फ एक हाउसिंग कॉलोनी की नहीं है; यह 1926 में बिहार और उड़ीसा वेटरनरी कॉलेज के लिए अधिग्रहित 640 एकड़ जमीन की कहानी है, जो देश के सबसे पुराने कॉलेजों में से एक है। दशकों बाद, वह जमीन संस्थागत दावों और राजनीतिक जांच की एक पहेली बन गई है। जब 2015 में बिहार वेटरनरी कॉलेज (BVC) ने एक पूर्ण विश्वविद्यालय के रूप में अपग्रेड होने की कोशिश की, तो विस्तार योजनाओं को एक बड़ी बाधा का सामना करना पड़ा: यह पता चला कि उनके अपने परिसर को विभिन्न सरकारी एजेंसियों और निजी हितों द्वारा धीरे-धीरे हड़प लिया गया था।

BVC परिसर का गणित सरल लेकिन चौंकाने वाला है। जबकि कॉलेज मूल रूप से अपनी इमारतों, हॉस्टलों और अस्तबलों के लिए लगभग 100 एकड़ जमीन का उपयोग करता था, शेष 540 एकड़ जमीन उसके स्वामित्व में थी। फिर भी, वर्षों से राज्य सरकार ने कॉलेज प्रशासन की सहमति लिए बिना इस जमीन को विभिन्न संस्थाओं को आवंटित कर दिया। 2016 तक, जब BVC ने अपनी जमीन वापस पाने के लिए पटना उच्च न्यायालय का रुख किया, तो अतिक्रमणकारियों—या अधिक सटीक रूप से, "आवंटितियों"—की सूची सार्वजनिक और निजी संस्थानों की एक निर्देशिका जैसी लग रही थी।

याचिका में नामित संस्थाओं में जय प्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, बीआईटी मेसरा परिसर और स्वयं कौटिल्य नगर कॉलोनी शामिल थी, जिसे 20 एकड़ जमीन आवंटित की गई थी। कानूनी चुनौती ने एक सरल सवाल खड़ा किया: यदि जमीन BVC की थी, तो इसे बिना प्राधिकरण के अन्य उपयोगों के लिए कैसे विभाजित किया जा सकता था? इसने इन संपत्तियों से जुड़े निवासियों और राजनीतिक हस्तियों को लंबे समय से कानूनी अस्पष्टता की स्थिति में छोड़ दिया है।

यह मामला महत्वपूर्ण क्यों है

यह प्रशासनिक अतिरेक और संस्थागत स्वायत्तता के टकराव का एक क्लासिक मामला है। "कौटिल्य नगर" का मामला इस बात का व्यापक उदाहरण है कि कैसे भारत में सार्वजनिक भूमि को अक्सर विभिन्न सरकारों द्वारा विवेकाधीन संपत्ति के रूप में माना जाता है। जब BVC जैसी संस्था—जो राज्य की कृषि रीढ़ के लिए महत्वपूर्ण है—अपनी ही सरकार की भूमि वितरण नीतियों के कारण विस्तार में बाधा का सामना करती है, तो यह शासन की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाता है। यह केवल इस बारे में नहीं है कि कौन कहाँ रहता है; यह सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के क्षरण और NDA या अन्य राज्य-स्तरीय गठबंधनों सहित विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं में भूमि प्रबंधन में जवाबदेही की कमी के बारे में है।

इस विशिष्ट भूमि विवाद के इर्द-गिर्द खामोशी, विशेष रूप से हाई-प्रोफाइल हस्तियों के संबंध में, अक्सर उन नौकरशाही अनुमोदनों के जटिल जाल से उत्पन्न होती है जो दशकों पहले दिए गए थे। हालांकि अन्य क्षेत्रों से हालिया विधायी अपडेट की खोज—जैसे कि तेलंगाना में बजट सत्र या विधानसभा की कार्यवाही (जिसे अक्सर आंध्रज्योति या इंडियाहेराल्ड जैसे आउटलेट्स द्वारा ट्रैक किया जाता है)—न्यूज साइकिल पर हावी हो सकती है, लेकिन पटना के भूमि रिकॉर्ड की स्थानीय, जमीनी हकीकत राज्य के लिए एक स्थायी और अनसुलझा सिरदर्द बनी हुई है।

चाहे इसमें राबड़ी देवी शामिल हों या अन्य राजनीतिक हितधारक जिन्होंने अपनी संपत्तियों के संबंध में सवालों का सामना किया है, मूल मुद्दा वही है: 1926 के मूल भूमि अधिग्रहण की पवित्रता। जब तक अदालतें इन 20 एकड़ जमीन की स्थिति स्पष्ट नहीं करतीं, तब तक कौटिल्य नगर के निवासी—और विस्तार की प्रतीक्षा कर रहा वेटरनरी विश्वविद्यालय—एक अनिश्चित स्थिति में फंसे रहेंगे। यहाँ बड़ी तस्वीर संस्थागत भूमि की रक्षा करने में प्रणालीगत विफलता है, एक ऐसा पैटर्न जो व्यक्तिगत राजनीतिक चक्रों से परे है और भारत में पारदर्शी भूमि ऑडिट की गहरी आवश्यकता को दर्शाता है।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।