विकास का विरोधाभास: बागी शिवसेना सांसदों का 'फंड की कमी' का दावा क्यों बेदम है
शिवसेना-UBT के 6 बागी सांसद फंड की कमी से नाराज थे, लेकिन उन्होंने विकास कार्यों के लिए केवल 1% से 26% राशि ही खर्च की | मुंबई समाचार
आधिकारिक आंकड़ों की गहराई से जांच करने पर पता चलता है कि शिंदे गुट में शामिल होने वाले छह UBT सांसदों ने अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास बजट का एक छोटा सा हिस्सा ही खर्च किया है।
मुंबई के राजनीतिक गलियारों में छह UBT सांसदों के पाला बदलने की चर्चा जोरों पर है, जिन्होंने शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का दामन थाम लिया। उनके जाने के पीछे एक नैरेटिव गढ़ा गया—बागी नेताओं की लगातार यह शिकायत रही कि उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्रों में आवश्यक विकास कार्य करने के लिए फंड नहीं मिल रहा था। लेकिन जैसा कि भारतीय राजनीति में अक्सर होता है, कागजी दस्तावेज कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।
कागजी हकीकत बनाम राजनीतिक बयानबाजी
सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) के तहत, प्रत्येक सांसद को सालाना ₹5 करोड़ मिलते हैं। ये फंड विशेष रूप से स्थानीय जरूरतों के अनुसार टिकाऊ सामुदायिक संपत्तियों—जैसे सीमेंट सड़कें, ड्रेनेज लाइन या कब्रिस्तान की दीवारें—बनाने के लिए होते हैं। जब ये फंड खर्च नहीं होते, तो वे खत्म नहीं होते; बल्कि वे अगले वित्तीय वर्ष में जुड़ जाते हैं।
केंद्र सरकार के आधिकारिक पोर्टल से प्राप्त आंकड़े इन छह बागी नेताओं के प्रदर्शन की एक कड़वी सच्चाई सामने लाते हैं। संसाधनों की 'कमी' से जूझने के बजाय, ये नेता एक बड़े और काफी हद तक अछूते फंड पर बैठे रहे हैं। पिछले तीन वर्षों में, इन सांसदों की फंड उपयोग दर बेहद खराब रही है, जो न्यूनतम 1.07% से लेकर अधिकतम केवल 26.84% तक है।
जमीनी स्तर पर प्रदर्शन
कार्यों के निष्पादन में भारी अंतर साफ नजर आता है। हिंगोली के सांसद नागेश पाटिल-आष्टिकर, जिन्होंने समूह में सबसे अधिक उपयोग दर्ज किया, वे अपने आवंटन का केवल 26.84% ही खर्च कर पाए। फिर भी, उनके द्वारा अनुशंसित 107 परियोजनाओं में से केवल 28 ही पूरी हो पाई हैं। दूसरी ओर, मुंबई उत्तर-पूर्व के सांसद संजय दीना पाटिल का रिकॉर्ड है, जिनकी उपयोग दर मात्र 1.07% है। उनके द्वारा प्रस्तावित 40 कार्यों में से एक भी पूरा नहीं हुआ है—चाहे वह खेल के मैदान का सौंदर्यीकरण हो या जल निकासी का काम।
अन्य बागियों के लिए भी यही पैटर्न दिखता है। धाराशिव के सांसद ओमराजे निंबालकर ने 130 कार्य प्रस्तावित किए, लेकिन केवल 21 पूरे हुए। परभणी के सांसद संजय जाधव की गति भी ऐसी ही सुस्त रही, जहां उनकी 81 सिफारिशों में से केवल 25 ही पूरी हो सकीं। शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत ने इस पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ये आंकड़े स्पष्ट रूप से बुनियादी शासन कर्तव्यों को पूरा करने में विफलता को उजागर करते हैं, जबकि फंड की कोई कमी नहीं थी।
बड़ी तस्वीर
यह महत्वपूर्ण क्यों है? तत्काल राजनीतिक विवाद से परे, यह रिपोर्ट उस पुरानी समस्या को उजागर करती है कि हम अपने प्रतिनिधियों का मूल्यांकन कैसे करते हैं। जब दलबदल को 'विकास की कमी' के दावों से उचित ठहराया जाता है, तो मतदाताओं को अक्सर यह विश्वास दिलाया जाता है कि सिस्टम खराब है या फंड को राजनीतिक हथियार के रूप में रोका गया था।
हालांकि, ये आंकड़े बताते हैं कि बाधा अक्सर पैसे की कमी नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है। जब वे सांसद जो पाला बदलने के लिए फंड की कमी का हवाला देते हैं, वे अपने मौजूदा बजट का ही उपयोग नहीं कर पाते, तो यह एक गहरी प्रणालीगत विफलता की ओर इशारा करता है। यह मतदाताओं के लिए एक असहज सवाल खड़ा करता है: क्या ये नेता वास्तव में अपने निर्वाचन क्षेत्रों की जरूरतों के लिए लड़ रहे हैं, या वे केवल राजनीतिक निष्ठा बदलने की जटिलताओं को छिपाने के लिए विकास को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं? जैसे-जैसे शिंदे गुट विस्तार के संकेत दे रहा है, ये आंकड़े हमें बयानबाजी से परे देखने और जमीन पर लंबित कार्यों की जांच करने की याद दिलाते हैं।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।