खाली डेस्क की समस्या: इंदौर में RTE की 4,000 सीटें अब भी क्यों खाली हैं
12,900 आवेदनों के बावजूद इंदौर में RTE की 4,000 से अधिक सीटें रिक्त
लगभग 13,000 आवेदकों की भारी रुचि के बावजूद, मध्य प्रदेश के शिक्षा केंद्र में नीतिगत इरादों और जमीनी हकीकत के बीच एक बड़ा अंतर बना हुआ है।
राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट का वादा एक सरल सामाजिक अनुबंध है: शहर के निजी स्कूलों में वंचित वर्ग के बच्चों की पहुंच सुनिश्चित करना। हालांकि, इंदौर में यह अनुबंध फिलहाल नौकरशाही की बाधाओं में उलझा हुआ है। प्रवेश के दो व्यापक दौर के बाद भी, आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि RTE छात्रों के लिए आरक्षित 4,000 से अधिक सीटें खाली हैं। यह एक चौंकाने वाला असंतुलन है, खासकर तब जब 2026-27 शैक्षणिक सत्र के लिए सिस्टम में 12,900 आवेदन पहले ही आ चुके हैं।
इस स्थिति से जूझ रहे अभिभावकों के लिए निराशा बढ़ती जा रही है। जिला शिक्षा विभाग अब काउंसलिंग का तीसरा दौर शुरू करके इस अंतर को पाटने की कोशिश कर रहा है। परिवारों को अपने स्कूल विकल्पों को अपडेट करने के लिए 8 जुलाई तक का सीमित समय दिया गया है, इस उम्मीद में कि विकल्पों के पुनर्मूल्यांकन से उन्हें आखिरकार वह सीट मिल सके जो अब तक नहीं मिल पाई है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: आंकड़ों के पीछे का असंतुलन
उच्च मांग के बावजूद इन रिक्तियों का बने रहना एक संरचनात्मक खामी की ओर इशारा करता है। यह जरूरी नहीं कि रुचि की कमी है, बल्कि यह उन सीटों के स्थान और आवेदकों के निवास स्थान के बीच का तालमेल न होना है। अक्सर, उपलब्ध कोटे वाले स्कूल उन परिवारों से भौगोलिक रूप से दूर होते हैं जिन्हें उनकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है, या वे उन परिवारों की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाते जिन्होंने पहले से ही सीमित और अत्यधिक मांग वाले संस्थानों पर अपनी उम्मीदें टिका रखी हैं।
यह केवल इंदौर की कहानी नहीं है; यह मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में दिखने वाले व्यापक पैटर्न को दर्शाता है, जहां शहरी विस्तार अक्सर शैक्षिक संसाधनों के समान वितरण से आगे निकल जाता है। जब आवंटित सीटों का लगभग एक तिहाई हिस्सा खाली पड़ा हो और हजारों अभिभावक अभी भी पुष्टि का इंतजार कर रहे हों, तो सिस्टम को केवल काउंसलिंग के तीसरे दौर से अधिक की आवश्यकता है—इसे स्थानीय स्कूली शिक्षा के मानचित्र पर अधिक बारीकी से देखने की जरूरत है।
आगे की राह
शिक्षा अधिकारी फिलहाल शेष क्षमता को भरने के लिए इस तीसरे दौर पर भरोसा कर रहे हैं। हालांकि, यदि मौजूदा रुझान जारी रहता है, तो प्रशासन को यह जांचने की आवश्यकता हो सकती है कि क्या परिवहन की सुलभता या संचार की कमी पात्र बच्चों को कक्षाओं से दूर रख रही है। शैक्षणिक सत्र की घड़ी टिक-टिक कर रही है, ऐसे में जिले की प्राथमिकता इस बैकलॉग को खत्म करना है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि RTE एक्ट का विधायी उद्देश्य—गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का समान अवसर प्रदान करना—जमीन पर वास्तव में पूरा हो सके।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।