अल नीनो का साया: क्यों बढ़ सकता है आपकी रसोई का बजट
अल नीनो की मार, मानसून पर संकट के साथ देश में महंगाई बढ़ने का बड़ा खतरा, जानिए नई रिपोर्ट
जैसे-जैसे मौसम का मिजाज बदल रहा है और वैश्विक तापमान के रिकॉर्ड टूट रहे हैं, भारत का आर्थिक पूर्वानुमान अल नीनो के बढ़ते प्रभाव के कारण एक जटिल चुनौती का सामना कर रहा है।
मानसून भारतीय अर्थव्यवस्था की धड़कन है, लेकिन इस सीजन में इसकी लय एक जाने-पहचाने और अनचाहे मेहमान 'अल नीनो' के कारण बिगड़ रही है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने पुष्टि की है कि यह घटना न केवल सक्रिय है, बल्कि पूरे मानसून के दौरान इसके बने रहने की संभावना है। ऐसे में कृषि और खुदरा बाजार पर इसके असर की आशंका बढ़ गई है। शोध बताते हैं कि अगस्त तक अल नीनो के प्रभाव की संभावना 80 प्रतिशत है, जो नवंबर तक 90 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है। हालांकि अभी जलाशयों का जलस्तर ठीक है और सब्जियों की आपूर्ति स्थिर दिख रही है, लेकिन यह स्थिरता काफी नाजुक है।
महंगाई का असर
चिंता केवल बारिश की कमी तक सीमित नहीं है। बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि अल नीनो और वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की अस्थिर कीमतों (जो 90 से 100 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहने की उम्मीद है) का मेल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई को चालू वित्त वर्ष में 5.2 प्रतिशत से 5.5 प्रतिशत के दायरे में रख सकता है।
यह केवल एक अनुमान नहीं है। हमने पहले ही रुझानों को बदलते देखा है; खाद्य और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण महंगाई अप्रैल के 3.5 प्रतिशत से बढ़कर मई में 3.9 प्रतिशत हो गई है। खाद्य महंगाई पहले ही 4.8 प्रतिशत पर है, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है। लोग भले ही अपनी दिनचर्या की योजना बनाने के लिए आવતીકાલનું હવામાન (कल के मौसम) के बारे में अपडेट खोज रहे हों, लेकिन जलवायु में हो रहे गहरे और संरचनात्मक बदलाव इस महंगाई चक्र को लंबा खींचने की धमकी दे रहे हैं।
यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर
इस el nino चक्र के आर्थिक निहितार्थ बहुआयामी हैं। जब ईंधन की कीमतें बढ़ती हैं, तो लॉजिस्टिक्स यानी खेतों से शहरों तक सामान पहुंचाने की लागत भी बढ़ जाती है। इससे 'कॉस्ट-पुश' महंगाई पैदा होती है, जहां कंपनियां बढ़े हुए खर्च का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाल देती हैं।
यह रुझान 'कोर इंफ्लेशन' (मूल महंगाई) में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है, जो बढ़कर 3.9 प्रतिशत हो गई है। यह बताता है कि कीमतों का दबाव केवल कुछ अस्थिर वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक बाजार में जड़ जमा रहा है। जब मौसम की अनिश्चितता वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की बाधाओं से मिलती है, तो अर्थव्यवस्था अपना सुरक्षा कवच खो देती है। चाहे हम europe में पारिस्थितिक बदलावों की बात करें या स्थानीय मानसून की, पैटर्न स्पष्ट है: जलवायु अस्थिरता अब व्यापक आर्थिक अस्थिरता का एक प्रमुख कारक बन गई है।
आगे की राह
आम नागरिक के लिए आने वाले कुछ महीने लचीलेपन की परीक्षा होंगे। हालांकि सब्जियों की तत्काल आपूर्ति स्थिर है, लेकिन परिवहन लागत और फसलों पर संभावित दबाव का मतलब है कि परिवारों को बजट में कटौती के लिए तैयार रहना चाहिए। मानसून सिर्फ बारिश के बारे में नहीं है; यह भारतीय बाजार के लिए आपूर्ति-पक्ष की स्थिरता का प्राथमिक स्रोत है। जैसा कि हम जलवायु अनुसंधान के original डेटा को ट्रैक कर रहे हैं, यह स्पष्ट है कि आने वाले महीनों में नीति निर्माताओं को जीवन यापन की लागत को नियंत्रण से बाहर होने से रोकने के लिए एक नाजुक संतुलन बनाने की आवश्यकता होगी।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।