अनिश्चितता की कीमत: दिल्ली यूनिवर्सिटी के सपने को छोड़कर 'सेफ्टी नेट' चुन रहे छात्र
रीटेस्ट और री-इवैल्यूएशन के बीच, छात्र DU के सपने को छोड़कर बैकअप कॉलेजों का रुख कर रहे हैं
CUET में देरी और मार्किंग में विसंगतियों के कारण प्रवेश प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, जिसके चलते हजारों छात्र अपनी पसंदीदा यूनिवर्सिटी में पढ़ने का सपना छोड़कर किसी भी कॉलेज में सीट सुरक्षित करने को मजबूर हैं।
साल के इस समय दिल्ली की प्रतिष्ठित केंद्रीय यूनिवर्सिटीज के गलियारे आमतौर पर छात्रों की चहल-पहल से भरे होते थे। लेकिन इस बार वहां एक गहरी चिंता का माहौल है। हजारों छात्रों के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) या जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) में दाखिले का सपना अब पीछे छूट रहा है और उसकी जगह एक व्यावहारिक 'बैकअप प्लान' ने ले ली है। कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) की अनिश्चितता और CBSE की ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम पर उठ रहे लगातार सवालों के कारण, परिवार अब शैक्षणिक कैलेंडर में देरी का जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं।
इस अनिश्चितता का आर्थिक बोझ तुरंत महसूस किया जा रहा है। दिल्ली की एक मेधावी छात्रा का ही उदाहरण लें, जिसे बोर्ड रिजल्ट देखने के बाद काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। री-इवैल्यूएशन के इंतजार में फंसी इस छात्रा ने अपने विकल्प खुले रखने के लिए महाराष्ट्र की एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी में भारी-भरकम राशि जमा कर दी है। इस 'सेफ्टी नेट' की कीमत? ₹22,000 की नॉन-रिफंडेबल कटौती, और यह राशि तब और बढ़ जाती है जब उसे अपनी पसंदीदा यूनिवर्सिटी से स्पष्टता मिलने में और देरी होती है।
दूसरों के लिए राह और भी कठिन है। भुवनेश्वर की एक छात्रा, जिसे आंसर-की और अपने रिजल्ट में भारी अंतर मिला, उसने केंद्रीय यूनिवर्सिटी का विचार ही छोड़ दिया है। वह अकेली नहीं है; कई ऐसे छात्र जो मौजूदा टेस्टिंग सिस्टम से निराश हैं, उन्होंने स्थानीय स्टेट यूनिवर्सिटीज में दाखिला लेना बेहतर समझा है। वे ऐसी केंद्रीकृत प्रणाली का इंतजार नहीं कर सकते, जिसके शेड्यूल में सुधार के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं।
शैक्षणिक व्यवस्था पर असर
दिल्ली यूनिवर्सिटी और JNU के शिक्षक संगठन लगातार आवाज उठा रहे हैं। उनका कहना है कि 2022 में लागू होने के बाद से ही केंद्रीकृत टेस्टिंग व्यवस्था ने यूनिवर्सिटी के शैक्षणिक कैलेंडर को बिगाड़ दिया है। हर कैंसिलेशन, हर रीटेस्ट और प्रशासनिक खामी का सीधा असर क्लासरूम पर पड़ रहा है, जिससे सेमेस्टर शुरू होने में देरी हो रही है और सिलेबस पूरा करने का दबाव बढ़ रहा है।
हालांकि पटना के 18 वर्षीय आकाश कुमार जैसे कुछ छात्र अभी भी रीशेड्यूल किए गए CUET के नतीजों का इंतजार करने के लिए अडिग हैं, लेकिन वे अपवाद हैं। अधिकांश छात्र इस अस्थिरता से थक चुके हैं। जून की शुरुआत में परीक्षा रद्द होने और फिर रीटेस्ट के तनाव को झेलने के बाद, 'निष्पक्ष' प्रक्रिया का वादा अब प्राइवेट कॉलेजों की तेजी से भरती सीटों की हकीकत के सामने फीका पड़ रहा है।
यह क्यों मायने रखता है
यह एक बड़ी प्रणालीगत कमजोरी की ओर इशारा करता है। जब उच्च शिक्षा का प्रवेश द्वार ही अव्यवस्था का पर्याय बन जाए, तो सार्वजनिक संस्थानों की साख प्राइवेट सेक्टर की कार्यक्षमता के सामने कम होने लगती है। मौजूदा स्थिति छात्रों और टेस्टिंग अथॉरिटीज के बीच बढ़ते अविश्वास को दर्शाती है। यदि यह प्रक्रिया उन छात्रों को ही दूर करती रहेगी जिनके लिए इसे बनाया गया है, तो हम एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं जहां केवल वही छात्र अपने सपनों के कॉलेज का इंतजार कर सकते हैं जिनके पास 'बैकअप' फीस देने के लिए आर्थिक संसाधन हैं। बाकी छात्र किसी भी ऐसे संस्थान में जाने को मजबूर हैं जो पहले दाखिला दे दे। लक्ष्य मानकीकरण (standardization) था, लेकिन फिलहाल परिणाम केवल 'बहिष्करण' (exclusion) है।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।