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समोसे परोसने वाला लड़का: शाहरुख खान की कहानी का एक अनसुना अध्याय

’10 साल के शाहरुख खान NSD में हमें समोसे सप्लाई करते थे’, पंकज कपूर ने सुनाया किस्सा

द्वारा कबीर शर्माप्रकाशित 23 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
समोसे परोसने वाला लड़का: शाहरुख खान की कहानी का एक अनसुना अध्याय
समोसे परोसने वाला लड़का: शाहरुख खान की कहानी का एक अनसुना अध्याय

बॉलीवुड के 'बादशाह' बनने से बहुत पहले, शाहरुख खान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में एक जाना-पहचाना चेहरा थे, लेकिन एक छात्र के रूप में नहीं, बल्कि एक सहायक के तौर पर।

किसी सुपरस्टार के जीवन का सफर अक्सर उसकी बड़ी उपलब्धियों—पहली हिट फिल्म, पहला अवॉर्ड या हाउसफुल स्टेडियम—से मापा जाता है। लेकिन शाहरुख खान की कहानी की शुरुआत NSD (नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) के व्यस्त गलियारों से होती है। दिग्गज अभिनेता पंकज कपूर ने हाल ही में अतीत की एक दुर्लभ और जमीनी हकीकत साझा की, जिसमें उन्होंने याद किया कि कैसे 10 साल की उम्र में शाहरुख खान उस थिएटर संस्थान का हिस्सा थे।

यह कला की दुनिया में कोई ग्लैमरस एंट्री नहीं थी। कपूर को याद है कि वह छोटा लड़का कैंपस में डायलॉग रिहर्सल के लिए नहीं, बल्कि स्नैक्स पहुँचाने के लिए आता था। उन दिनों, कैंटीन की सेवा सीधे कलाकारों तक पहुँचती थी, और नन्हे शाहरुख अक्सर सीनियर छात्रों और उभरते कलाकारों को समोसे पहुँचाया करते थे। यह कल्पना करना भी दिलचस्प है कि वैश्विक सिनेमा का भविष्य का आइकन, भारत के इस प्रतिष्ठित संस्थान के गलियारों में एक डिलीवरी बॉय की तरह घूमता था।

कैंटीन से सिल्वर स्क्रीन तक

यह किस्सा सिर्फ पुरानी यादें नहीं है; यह उस दौर की दिल्ली के थिएटर कल्चर की एक झलक है। भले ही इन घटनाओं का जिक्र करने वाले original article डिजिटल दुनिया में कहीं खो गए हों या error-410 पेज की भेंट चढ़ गए हों, लेकिन इंडस्ट्री के गलियारों में ये कहानियाँ आज भी जीवंत हैं। जो लोग उस संस्थान का हिस्सा रहे हैं, उनके लिए ये कहानियाँ स्कूल की समृद्ध विरासत का आधार हैं।

समोसे पहुँचाने वाले लड़के और दुनिया के सबसे बड़े फिल्म सेट्स पर राज करने वाले सुपरस्टार के बीच का अंतर बहुत गहरा है। फिर भी, यह कई दिग्गजों के जीवन के एक सामान्य पहलू को दर्शाता है: कला के प्रति शुरुआती और अनजाने में हुआ जुड़ाव। पंकज कपूर जैसे दिग्गजों की गहन रिहर्सल को देखना निश्चित रूप से उस छोटे लड़के के मन पर एक छाप छोड़ गया होगा, जो वहाँ सिर्फ एक काम के सिलसिले में आता था।

यह कहानी क्यों महत्वपूर्ण है

इस कहानी का महत्व हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में 'संघर्ष की गाथा' में निहित है। ऐसे दौर में जब नेपोटिज्म और विशेषाधिकार पर बहस छिड़ी हो, यह जानना कि शाहरुख खान जैसे दिग्गज ने एक कला संस्थान में छोटे-मोटे काम से शुरुआत की थी, एक प्रेरणा देता है। यह एक 'आउटसाइडर' की उस कहानी को पुख्ता करता है, जो मंच पर आने से बहुत पहले ही कला के उस परिवेश का हिस्सा था।

यह दिल्ली की थिएटर संस्कृति की उस सहजता को भी दर्शाता है, जहाँ सर्विस स्टाफ, छात्रों और प्रोफेसरों के बीच की सीमाएँ अक्सर कला के प्रति साझा जुनून के कारण धुंधली हो जाती थीं। शाहरुख के शुरुआती वर्षों को खंगालने वाले प्रशंसकों और शोधकर्ताओं के लिए, ये किस्से एक मानवीय पहलू जोड़ते हैं जिसे प्रेस रिलीज कभी नहीं बता सकती। यह सिर्फ खाने की बात नहीं थी, बल्कि महानता के करीब होने का अनुभव था, जिसने शायद शाहरुख के करियर की उस दृढ़ता को आकार दिया, जो आज हम देखते हैं।

द्वारा कबीर शर्मा
फ़ीचर्स लेखक

कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।