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ला रोजा के शिल्पकार: लुइस डे ला फुएंते ने कैसे बदली स्पेनिश फुटबॉल की तस्वीर

कोचों के कोच, जिन्होंने अपने युवा खिलाड़ियों पर जताया भरोसा | फुटबॉल न्यूज़

द्वारा अर्जुन मेहताप्रकाशित 15 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
ला रोजा के शिल्पकार: लुइस डे ला फुएंते ने कैसे बदली स्पेनिश फुटबॉल की तस्वीर
ला रोजा के शिल्पकार: लुइस डे ला फुएंते ने कैसे बदली स्पेनिश फुटबॉल की तस्वीर

युवा विकास से लेकर यूरोपीय गौरव के शिखर तक के करियर के साथ, स्पेन के मुख्य कोच ने एक सुस्त पड़ी राष्ट्रीय टीम को विश्व कप की एक मजबूत दावेदार में बदल दिया है।

दिसंबर 2022 में स्पेन की पुरुष फुटबॉल टीम एक निराशाजनक दौर से गुजर रही थी। कतर विश्व कप में मोरक्को के हाथों मिली जल्दी हार के बाद, वह टीम—जो कभी दुनिया के लिए ईर्ष्या का विषय थी—अपनी पहचान खोती हुई नजर आ रही थी। आलोचनाएं तीखी थीं; टीम पर आरोप था कि वे केवल गेंद को इधर-उधर घुमा रहे हैं और उनमें उस महान 'गोल्डन जनरेशन' वाली धार की कमी है। लुइस एनरिक के पद छोड़ने के बाद एक ऐसा खालीपन पैदा हुआ जिसे भरने के लिए लोग किसी बड़े नाम वाले रणनीतिकार की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन इसके बजाय, फेडरेशन ने लुइस डे ला फुएंते पर दांव लगाया, एक ऐसा शख्स जिसने अपना पूरा करियर युवा सेटअप की परछाई में बिताया था।

जीत की ओर लंबा सफर

डे ला फुएंते की नियुक्ति को शुरुआत में संदेह की नजर से देखा गया। 61 साल की उम्र में, उन्होंने कभी किसी सीनियर अंतरराष्ट्रीय टीम को नहीं संभाला था। उनके कार्यकाल की शुरुआत में ही दूसरा मैच एक बड़ा झटका था, जिसमें यूरो 2024 क्वालीफायर के दौरान स्कॉटलैंड से 2-0 की हार मिली। कई लोगों के लिए यह एक बड़े संकट का संकेत था। हालांकि, यह नतीजा एक बड़े बदलाव का उत्प्रेरक साबित हुआ। वर्षों तक U-19, U-21 और ओलंपिक टीम को संभालने के कारण, डे ला फुएंते को स्पेन के उभरते हुए टैलेंट पूल की गहरी समझ थी।

उन्होंने स्थापित पदानुक्रम से हटकर उन खिलाड़ियों के इर्द-गिर्द टीम बनाने का फैसला किया जिन्हें उन्होंने खुद तराशा था। अपने पहले 10 मैचों में, उन्होंने 12 खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय डेब्यू का मौका दिया। अपने युवा खिलाड़ियों की भूख पर भरोसा जताते हुए, उन्होंने हाल के वर्षों की सतर्क और धीमी पासिंग वाली शैली को बदलकर एक हाई-एनर्जी, आक्रामक दर्शन अपनाया। परिणाम तुरंत मिले: 2023 में UEFA नेशंस लीग का खिताब और उसके बाद यूरो 2024 में शानदार जीत।

बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है

यह पुनरुत्थान केवल कुछ अच्छे नतीजों का सिलसिला नहीं है; यह इस बात का बुनियादी बदलाव है कि कैसे एक राष्ट्रीय टीम विफलता से प्रभुत्व की ओर बढ़ सकती है। स्पेन ने 2010 के बाद से विश्व कप में कोई नॉकआउट मैच नहीं जीता था, एक ऐसा सूखा जो फेडरेशन पर साये की तरह मंडरा रहा था। डे ला फुएंते की सफलता संस्थागत निरंतरता के महत्व को उजागर करती है। ग्रासरूट पाइपलाइन को समझने वाले कोच पर भरोसा करके, स्पेन ने सिस्टमैटिक डेवलपमेंट और एलीट परफॉरमेंस के बीच की खाई को पाट दिया है।

जैसे-जैसे टीम उत्तरी अमेरिका में होने वाले आगामी विश्व कप की तैयारी कर रही है, वे टूर्नामेंट के पसंदीदा के रूप में जा रहे हैं—जो दो साल पहले की उनकी स्थिति के बिल्कुल विपरीत है। कोच के नेतृत्व में हुआ रणनीतिक विकास, जिसमें मिकेल मेरिनो जैसे प्रमुख खिलाड़ियों की बहुमुखी प्रतिभा का भी बड़ा योगदान रहा है, ने साबित कर दिया है कि कायाकल्प के लिए हमेशा पूरी टीम को बदलने की जरूरत नहीं होती, बल्कि पहले से ही युवा लीग में परखे गए टैलेंट को सही तरीके से एकीकृत करने की आवश्यकता होती है।

ला रोजा के लिए एक नया युग

डे ला फुएंते के नेतृत्व में स्पेनिश टीम का रूपांतरण शांत आत्मविश्वास का एक उदाहरण है। जहां फुटबॉल की दुनिया अक्सर कोचिंग में 'अगले बड़े नाम' के पीछे भागती है, वहीं स्पेनिश फेडरेशन का 'कोचों के कोच' को आगे बढ़ाने का फैसला सफलता का एक टिकाऊ मॉडल साबित हुआ है। क्या यह युवा जोश विश्व कप के वैश्विक मंच पर भी कायम रह पाएगा, यह देखना बाकी है, लेकिन स्पेनिश फुटबॉल की कहानी पूरी तरह बदल चुकी है। बिना लक्ष्य वाली पजेशन (गेंद पर नियंत्रण) के दिन लद गए हैं; नई 'ला रोजा' गति, इरादे और गोल की निर्मम तलाश के लिए बनी है।

द्वारा अर्जुन मेहता
राष्ट्रीय मामले संवाददाता

अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।