शेखर सुमन का तंज: 'कॉकरोच जनता पार्टी' को दी नसीहत, केजरीवाल और मोदी पर भी साधा निशाना
'कॉकरोच का मुखिया लू में औंधा हो गया', शेखर सुमन ने कॉकरोच जनता पार्टी को किया रोस्ट, PM मोदी को भी घेरा
मशहूर अभिनेता और शो होस्ट शेखर सुमन ने अपने शो के हालिया एपिसोड में नई राजनीतिक हलचल और दिल्ली के जंतर-मंतर के इतिहास पर तीखे कटाक्ष किए हैं।
जंतर-मंतर और 'पलटने' का इतिहास
लोकप्रिय शो 'शेखर टुनाइट' के पांचवें एपिसोड में अभिनेता शेखर सुमन ने एक बार फिर अपने चिर-परिचित व्यंग्यात्मक अंदाज में राजनीतिक गलियारों की हवा का रुख मोड़ा है। इस बार निशाने पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' और उसके मुखिया अभिजीत दीपके हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुई क्लिप में शेखर सुमन ने इन नए राजनीतिक दावेदारों को जंतर-मंतर से 'छू-मंतर' न होने की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि जंतर-मंतर का इतिहास गवाह है कि यहाँ आए कई लोग अपनी बातों से पलट गए हैं।
केजरीवाल पर सीधा हमला
अपनी बात को पुख्ता करने के लिए शेखर ने आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के पुराने वादों का जिक्र किया। उन्होंने तंज कसा कि केजरीवाल ने राजनीति में न आने, सरकारी आवास और गाड़ी न लेने जैसे कई दावे किए थे, लेकिन बाद में वे अपनी बातों से मुकर गए। शेखर ने बड़े ही मजाकिया अंदाज में कहा कि 'कॉकरोच जनता पार्टी' को इन उदाहरणों से सीख लेनी चाहिए और जनता की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहिए, वरना उनकी स्थिति वैसी ही हो जाएगी जैसे एक कॉकरोच की होती है जो एक बार उलट जाए तो सीधा नहीं हो पाता।
सियासत और तपती धूप
यह रिपोर्ट तैयार करते समय यह स्पष्ट हुआ कि शेखर सुमन का यह आक्रामक रुख केवल एक पार्टी तक सीमित नहीं रहा। जब सीजेपी के मुखिया अभिजीत दीपके, जो हाल ही में अमेरिका से लौटे हैं, जंतर-मंतर पर भीषण लू और तपती धूप के बीच बेहोश हुए, तो शेखर ने इस मौके का इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर निशाना साधने के लिए भी किया। इस एपिसोड में अतिथि के रूप में पहुंचे अभिनेता मनोज बाजपेयी के सामने उन्होंने जिस तरह से इन मुद्दों को पिरोया, उसने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है।
बड़ी तस्वीर: क्या मायने हैं?
राजनीतिक व्यंग्य हमेशा से भारत में सत्ता से सवाल पूछने का एक सशक्त माध्यम रहा है। शेखर सुमन जैसे कलाकारों का मुख्यधारा की राजनीति पर इस तरह की टिप्पणी करना यह दर्शाता है कि आम जनता और मनोरंजन जगत के सितारे अब नए राजनीतिक प्रयोगों को कितनी बारीकी से देख रहे हैं। जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों का इतिहास यह बताता है कि आंदोलन से निकली पार्टियां अक्सर सत्ता के गलियारों में पहुंचकर अपने मूल सिद्धांतों से भटक जाती हैं। शेखर का यह 'रोस्ट' केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जनता के उस अविश्वास की अभिव्यक्ति है जो अक्सर चुनावी वादों और जमीनी हकीकत के बीच पैदा होता है।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।