लखनऊ में बिजली का झटका: बिना सूचना लोड बढ़ाने पर उपभोक्ताओं का फूटा गुस्सा
बिना नोटिस लोड बढ़ाने पर भड़के उपभोक्ता, बिजली कार्यालयों पर उमड़ी भीड़
करीब 47 लाख उपभोक्ताओं का बिजली लोड मनमाने तरीके से बढ़ाने के विरोध में राजधानी के दफ्तरों में उमड़ी भीड़, विभाग पर लगा नियम तोड़ने का आरोप।
लखनऊ के बिजली दफ्तरों में शनिवार की सुबह कुछ अलग ही गहमागहमी थी। हुसैनगंज, गोमतीनगर, पुरनिया और इंद्रलोक कॉलोनी स्थित बिजली कार्यालयों के बाहर उपभोक्ताओं की लंबी कतारें और तीखी बहसें इस बात की गवाह थीं कि एक प्रशासनिक निर्णय ने आम घरों के बजट को हिलाकर रख दिया है। बिना किसी पूर्व सूचना या सहमति के, राज्य में लगभग 46.79 लाख बिजली उपभोक्ताओं का लोड अचानक बढ़ा दिया गया है।
उपभोक्ताओं का आरोप है कि उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन ने यह फैसला 'चोर दरवाजे' से अपनी कमाई बढ़ाने के लिए लिया है। नियामक आयोग की गाइडलाइंस को ताक पर रखकर की गई इस वृद्धि ने न केवल घरेलू बजट को प्रभावित किया है, बल्कि छोटे व्यापारियों की आजीविका पर भी सीधा प्रहार किया है। ग्रेटर लखनऊ जनकल्याण महासमिति जैसे संगठनों ने इसे उपभोक्ताओं के साथ सरासर धोखा करार दिया है।
जमीनी हकीकत: जबरन थोपा गया अतिरिक्त भार
विरोध की आग में सुलग रहे उपभोक्ताओं के पास ठोस उदाहरण हैं। गोमतीनगर के रितेश शर्मा हों या दुबग्गा के रसूल मोहम्मद और राजाजीपुरम के शिवम यादव—इन सभी के बिजली कनेक्शन का स्वीकृत लोड रातों-रात एकतरफा तरीके से बढ़ा दिया गया। विभाग की इस कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि जब बिजली विभाग पहले से ही स्वीकृत लोड से अधिक उपभोग करने पर जुर्माना वसूलता है, तो ऐसे में बिना अनुमति लोड बढ़ाने का कोई तार्किक आधार नहीं बनता। यह विद्युत विभाग की कार्यक्षमता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
यह मामला महज कुछ किलोवाट की वृद्धि का नहीं है, बल्कि भरोसे और पारदर्शिता का है। उपभोक्ताओं का कहना है कि यदि उन्हें अपनी खपत बढ़ानी होती, तो वे खुद आवेदन करते। बिना किसी नोटिस के थोपे गए इस अतिरिक्त फिक्स्ड चार्ज का सीधा असर मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग की जेब पर पड़ रहा है।
क्यों है यह मामला अहम?
इस घटना का विश्लेषण करें तो यह प्रशासनिक मनमानी का एक पैटर्न दिखाता है। अक्सर सरकारी उपक्रम घाटे की भरपाई के लिए ऐसी 'हिडन' वृद्धि का सहारा लेते हैं, जो जनता में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करती है। यह रिपोर्ट एक primary source की तरह संकेत देती है कि यदि इस आदेश को तुरंत वापस नहीं लिया गया, तो राज्य भर में बड़े स्तर पर जन-आंदोलन खड़ा हो सकता है। फिलहाल, उपभोक्ता संगठन ऊर्जा मंत्री के हस्तक्षेप का इंतजार कर रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर Hindustan की ग्राउंड रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि यह न केवल एक तकनीकी त्रुटि है, बल्कि उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन भी है। आने वाले दिनों में पावर कॉर्पोरेशन का रुख ही तय करेगा कि क्या यह विभाग अपनी गलती सुधारेगा या फिर एक नई कानूनी लड़ाई का दौर शुरू होगा।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।