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दिल्ली में सियासी तूफान: TMC में बढ़ी दरार, बागी सांसदों ने NDA की ओर बढ़ाया कदम

TMC का संकट गहराया: 14 बागी सांसदों ने सुवेंदु अधिकारी से मुलाकात कर पार्टी छोड़ने पर चर्चा की, इधर ममता बनर्जी INDIA गठबंधन की बैठक में व्यस्त रहीं।

द्वारा विश्व डेस्कप्रकाशित 9 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
दिल्ली में सियासी तूफान: TMC में बढ़ी दरार, बागी सांसदों ने NDA की ओर बढ़ाया कदम
दिल्ली में सियासी तूफान: TMC में बढ़ी दरार, बागी सांसदों ने NDA की ओर बढ़ाया कदम

घटनाक्रम में आए एक नाटकीय मोड़ के तहत, TMC के 14 बागी सांसदों ने दिल्ली में सुवेंदु अधिकारी के साथ बंद कमरे में बैठक की है, जो ममता बनर्जी की पार्टी के लिए अस्तित्व के संकट का संकेत है।

सत्ता के गलियारों में यह विडंबना साफ देखी जा सकती थी। जिस जगह ममता बनर्जी 'इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस' (INDIA) गठबंधन की बैठक में अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रही थीं, उससे महज तीन किलोमीटर दूर तृणमूल कांग्रेस (TMC) बिखरती नजर आई। पार्टी नेतृत्व से नाराज 14 बागी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर दो घंटे बिताए, जहां बंगाल भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने पूरी चर्चा की निगरानी की।

संकट के मुहाने पर खड़ी पार्टी

पिछले महीने विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद से सुलग रही नाराजगी इस हफ्ते चरम पर पहुंच गई। इसकी तस्वीरें पार्टी के लिए बेहद नुकसानदेह रहीं: एक तरफ ममता जहां वापसी के लिए राष्ट्रीय सहयोगियों का साथ तलाश रही थीं, वहीं बंगाल में उनके अपने ही घर से वरिष्ठ नेताओं का पलायन शुरू हो गया। राज्यसभा के अनुभवी सदस्य सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी के भीतर 'अराजक शासन' और 'अनियंत्रित भ्रष्टाचार' का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया—यह एक तीखी टिप्पणी है जो पार्टी के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में बढ़ते असंतोष को दर्शाती है।

बागी अब अपने इरादे छिपा नहीं रहे हैं। बारासात की सांसद काकोली घोष दस्तीदार, जिन्होंने पिछले हफ्ते पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था, ने पुष्टि की कि लगभग 20 सांसद अब पाला बदलने की तैयारी में हैं। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर औपचारिक रूप से NDA-गठबंधन के साथ अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है। TMC के लिए यह गणितीय दुःस्वप्न है; दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए बागियों को लोकसभा के 28 सदस्यों में से कम से कम 19 की जरूरत है। ऐसी चर्चाएं हैं कि 22 सांसद भाजपा के संपर्क में हैं, जिससे पार्टी का संसदीय दल पूरी तरह बिखरने की कगार पर खड़ा है।

यह क्यों मायने रखता है: कमान का कमजोर होना

यह विद्रोह केवल पाला बदलने की कवायद से कहीं बढ़कर है; यह उस पूर्ण नियंत्रण के अंत का संकेत है जो ममता बनर्जी का कभी अपनी पार्टी पर हुआ करता था। पैटर्न स्पष्ट है: चुनाव के बाद के नतीजों ने पार्टी आलाकमान के खिलाफ गहरे असंतोष को उजागर कर दिया है। जब शताब्दी रॉय जैसी वरिष्ठ नेता असंतुष्टों के लिए अपने दरवाजे खोलती हैं, तो यह संकेत मिलता है कि 'TMC ब्रांड' में अब पहले जैसी निष्ठा नहीं बची है।

यदि यह पलायन जारी रहा, तो TMC संसद में पंगु हो जाएगी और एक एकजुट विपक्षी ताकत के रूप में काम करने में असमर्थ होगी। भाजपा के लिए यह एक रणनीतिक जीत है, जिसने बंगाल में अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी को भीतर से ही बेअसर कर दिया है। ममता के लिए अब चुनौती सिर्फ INDIA गठबंधन को संभालना नहीं है, बल्कि अपने घर में हो रहे इस नुकसान को रोकना है, वरना लोकसभा में उनकी ताकत इतनी कम हो जाएगी कि वे अप्रासंगिक हो जाएंगी।

आगे की राह

पार्टी की राज्य स्तरीय संरचना भी बुरी तरह बिखरी हुई है, जिससे अराजकता और बढ़ गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई हालिया संकट बैठक में केवल आठ विधायक ही शामिल हुए। दलबदल विरोधी कानून की तलवार बागियों पर लटकी हुई है, इसलिए अगले कुछ दिन अंकों के इस खेल में बेहद अहम होंगे। जैसे-जैसे भाजपा बंगाल में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रही है, TMC का एक एकजुट इकाई के रूप में टिके रहना पहले से कहीं अधिक बड़ी परीक्षा बन गया है।

द्वारा विश्व डेस्क
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