बागी तेवर और सियासी गणित: बंगाल की TMC में बढ़ती दरार
'विद्रोही' गुट की नई चाल! लोकसभा सचिवालय में स्थिति स्पष्ट करते हुए सांसद ने कहा, 'दीदी के साथ संबंध अटूट रहेंगे'
जैसे ही उन्नीस सांसदों ने एक अलग संसदीय पहचान की मांग करते हुए पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, तृणमूल कांग्रेस (TMC) की आंतरिक स्थिरता नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक परीक्षा का सामना कर रही है।
दिल्ली के सत्ता के गलियारों में इस मंगलवार को एक शांत लेकिन बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब हुगली की सांसद रचना बनर्जी ने अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट करने के लिए लोकसभा सचिवालय का रुख किया। सचिव उत्पल कुमार सिंह के साथ उनकी मुलाकात उन घटनाओं की श्रृंखला में एक निर्णायक मोड़ है, जिसने तृणमूल कांग्रेस (TMC) को अभूतपूर्व आंतरिक विद्रोह से जूझने पर मजबूर कर दिया है। बागी गुट के करीबी सूत्रों ने पुष्टि की है कि काकोली घोष दस्तीदार, शताब्दी रॉय और सायनी घोष जैसे हाई-प्रोफाइल चेहरों सहित उन्नीस सांसदों के हस्ताक्षरों वाला एक पत्र स्पीकर को सौंपा गया है, जिसमें NCPI (नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया) के बैनर तले एक अलग संसदीय गुट के रूप में मान्यता मांगी गई है।
यह समय महज एक संयोग नहीं है। पार्टी के चुनावी झटकों और आंतरिक खींचतान का सामना करने के बीच, बागी नेता दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के गणित पर दांव लगा रहे हैं। अपनी संसदीय सदस्यता खोए बिना कानूनी रूप से अलग होने के लिए, उन्हें पार्टी की कुल संख्या के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता है। उन्नीस नामों की सूची सौंपकर, यह समूह उस महत्वपूर्ण आंकड़े को पार करने का दावा कर रहा है। यूसुफ पठान से लेकर शताब्दी रॉय तक के विविध नामों वाली यह सूची, पार्टी नेतृत्व के भीतर बढ़ते वैचारिक और रणनीतिक विभाजन को दर्शाती है।
सेलिब्रिटी विरोधाभास
बागी खेमे में अभिनेता से नेता बने लोगों की मौजूदगी ने बंगाली मीडिया जगत में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। हालांकि रचना बनर्जी ने अपनी मुलाकात के बाद नपा-तुला रुख अपनाते हुए जोर देकर कहा कि ममता बनर्जी के साथ उनके 'सच्चे संबंध' बरकरार हैं, लेकिन उनके कदम उनके निर्वाचन क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र से सहयोग लेने की ओर झुकाव का संकेत देते हैं। यही दोहरापन घाटल के सांसद दीपक अधिकारी, यानी 'देव' के मामले में भी दिखता है, जिनके बागी पत्र पर हस्ताक्षर ने भ्रम की एक नई लहर पैदा कर दी है, जबकि उन्होंने हाल ही में पार्टी प्रमुख के प्रति अपनी निष्ठा सार्वजनिक रूप से जताई थी।
इस संकट की राजनीतिक भाषा हस्ताक्षरों और गुप्त बैठकों के जरिए लिखी जा रही है। हालांकि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक असंतोष की अभिव्यक्ति अक्सर मुखर रही है, लेकिन यह विशिष्ट कदम ठंडी और प्रक्रियात्मक चालों पर आधारित है। NCPI, जो 2023 की शुरुआत में चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में सामने आई थी, अब इस विधायी उथल-पुथल का संभावित जरिया बन गई है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह केवल व्यक्तिगत असंतोष का मामला नहीं है; यह TMC के संगठनात्मक ढांचे में एक बुनियादी दरार का प्रतिनिधित्व करता है। यदि स्पीकर बागियों की याचिका स्वीकार कर लेते हैं, तो लोकसभा में TMC का प्रभाव काफी कम हो जाएगा, जिससे राज्य और उससे बाहर सत्ता का संतुलन बदल जाएगा। महुआ मोइत्रा जैसे पार्टी वफादारों द्वारा इसे 'सफाई प्रक्रिया' करार दिया जाना पार्टी के भीतर की गहरी कड़वाहट को उजागर करता है। पर्यवेक्षकों के लिए, यह चलन एक बदलाव का संकेत है: वह पार्टी जो कभी एकजुट निष्ठा का प्रतीक थी, अब खंडित जनादेश की हकीकत से जूझ रही है, जहां स्थानीय विकास की चिंताएं और राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरण प्रतिनिधियों को विपरीत दिशाओं में खींच रहे हैं।
जैसे-जैसे इस अशांति का राजनीतिक स्रोत विकसित हो रहा है, अब सबकी निगाहें स्पीकर कार्यालय पर टिकी हैं। क्या यह औपचारिक विभाजन की ओर ले जाएगा या यह एक अस्थायी गतिरोध है, यह देखना बाकी है, लेकिन एक बात स्पष्ट है—पश्चिम बंगाल के लिए संसदीय परिदृश्य एक ऐसे बदलाव से गुजर रहा है जो आगामी जून सत्रों के बाद भी गूंजेगा। चाहे यह सत्ता की राजनीति के वर्णमाला का विश्लेषण हो या क्षेत्रीय प्रभाव की बहुभाषी पहुंच की गहराई, सामने आ रही घटनाएं बताती हैं कि बंगाल की राजनीति के पुराने समीकरणों को वास्तविक समय में फिर से लिखा जा रहा है।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।