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Raakh: जब दिल्ली की एक पुरानी त्रासदी की यादें फिर से स्क्रीन पर लौट आईं

‘Raakh’ रिव्यू: बर्बरता की एक वीभत्स कहानी, जिसमें मानवीय संवेदनाओं की झलक भी है

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 12 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
Raakh: जब दिल्ली की एक पुरानी त्रासदी की यादें फिर से स्क्रीन पर लौट आईं
Raakh: जब दिल्ली की एक पुरानी त्रासदी की यादें फिर से स्क्रीन पर लौट आईं

1978 के चोपड़ा अपहरण कांड को एक महत्वाकांक्षी तरीके से पेश करती प्राइम वीडियो की यह सीरीज यह दिखाती है कि कैसे किसी शहर के सामूहिक आघात (ट्रॉमा) को आधुनिक दर्शकों के लिए फिर से तैयार किया जाता है।

1970 के दशक की बारिश से भीगी दिल्ली की सड़कें एक खौफनाक कहानी की पृष्ठभूमि तैयार करती हैं: दो भाई-बहन, सुमन और साहिल शर्मा, एक लिफ्ट लेते हैं जो उन्हें दो दरिंदों के चंगुल में फंसा देती है। जो लोग गीता और संजय चोपड़ा केस की भयावह सच्चाई को याद करते हैं, उनके लिए Raakh सिर्फ एक और क्राइम थ्रिलर नहीं है। यह एक राष्ट्रीय जख्म की काल्पनिक पड़ताल है। अनुषा नंदकुमार, संदीप साकेत और प्रोसित रॉय द्वारा निर्देशित यह सीरीज इस क्रूर ऐतिहासिक अध्याय को उठाती है और अपना ध्यान जांच अधिकारी जयप्रकाश पर केंद्रित करती है, जिसे अली फज़ल ने अपनी गहरी और थकी हुई अदाकारी से जीवंत किया है।

समय में फंसी एक पुलिसिया जांच

भले ही इस शो का प्रोडक्शन काफी भव्य है और सौम्यनंदा साही की सिनेमैटोग्राफी दिल को छू लेने वाली है, लेकिन यह एक क्लासिक 'अडैप्टेशन' दुविधा का सामना करता है। कहानी को एक आधुनिक पुलिस प्रोसीजरल के रूप में ढालने के चक्कर में, निर्माता कभी-कभी उस दौर की गंभीरता को खो देते हैं। एक ईमानदार लेकिन राजनीतिक दबाव में घिरे जयप्रकाश के नेतृत्व में यह जांच डिजिटल युग की तेजी के साथ आगे बढ़ती है, जो 70 के दशक के लैंडलाइन फोन और शांत सड़कों के माहौल से मेल नहीं खाती। हम जयप्रकाश को ऑफिस की राजनीति और व्यक्तिगत उलझनों के बीच जूझते देखते हैं, जिसमें उसका पत्रकार दोस्त निसार उसकी मदद करता है। निसार उन वास्तविक पत्रकारों जैसे उषा राय का प्रतिनिधित्व करता है, जिन्होंने इस खौफनाक घटना को पहली बार जनता के सामने रखा था।

कहानी को दोबारा कहने का बोझ

Raakh की ताकत इसके अभिनय में है, विशेष रूप से सोनाली बेंद्रे में, जो एक दुखी मां 'मोना' की भूमिका में हैं। अपने बेटे साहिल को दिया गया उनका निर्देश—"अपनी बहन का बॉडीगार्ड बनना"—आज के नजरिए से एक दुखद विडंबना लगता है। हालांकि, सीरीज कभी-कभी सनसनीखेज लहजे की ओर झुक जाती है, जो त्रासदी की मानवीय कीमत को दबाने का खतरा पैदा करती है। यह कातिलों, बाबू और रज्जो की दरिंदगी को तो दिखाती है, लेकिन 1978 की वास्तविक घटना के वजन और आधुनिक थ्रिलर के फॉर्मूले के बीच संतुलन बनाने में संघर्ष करती है।

यह क्यों मायने रखता है: ट्रू क्राइम की राजनीति

यह रूपांतरण भारतीय मीडिया के एक पुराने पैटर्न को सामने लाता है: अतीत के हाई-प्रोफाइल अपराधों को बार-बार कुरेदने का हमारा जुनून। जब हम ऐतिहासिक त्रासदियों को एपिसोडिक कंटेंट के रूप में देखते हैं, तो 'श्रद्धांजलि' और 'मनोरंजन' के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। चोपड़ा केस, जिसका अंत बिल्ला और रंगा को फांसी मिलने के साथ हुआ, भारत में कानून-व्यवस्था के लिए एक निर्णायक मोड़ था। इसे ओटीटी प्लेटफॉर्म पर लाकर, निर्माता नई पीढ़ी को इस केस से जोड़ तो रहे हैं, लेकिन वे कच्चे, राष्ट्रीय दुख को एक 'कमोडिटी' में बदलने का जोखिम भी उठा रहे हैं। शो की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि क्या यह हमें उन सामाजिक विफलताओं पर सोचने के लिए मजबूर कर पाता है जिनकी वजह से ऐसा अपराध हुआ, या फिर यह इस त्रासदी का इस्तेमाल सिर्फ एक तेज-तर्रार जासूसी कहानी के लिए कर रहा है।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।