प्रोजेक्ट ग्लासविंग: भारत के डिजिटल फ्रंटियर को कैसे मिला एंथ्रोपिक के Mythos AI का एक्सेस
प्रोजेक्ट ग्लासविंग: भारत की प्रमुख साइबर सुरक्षा एजेंसियां अब एंथ्रोपिक के Mythos मॉडल का करेंगी इस्तेमाल

राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा को एक बड़ी मजबूती देते हुए, भारत की प्रमुख सरकारी एजेंसियां एंथ्रोपिक (Anthropic) के शक्तिशाली और अभी तक सार्वजनिक न किए गए 'Mythos' मॉडल का एक्सेस प्राप्त कर रही हैं, ताकि महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को सुरक्षित किया जा सके।
भारत का साइबर सुरक्षा परिदृश्य एक बड़े तकनीकी बदलाव के लिए तैयार है। सरकार ने अमेरिका स्थित फर्म एंथ्रोपिक की एक महत्वपूर्ण पहल 'प्रोजेक्ट ग्लासविंग' (Project Glasswing) तक पहुंच हासिल कर ली है। इस कार्यक्रम के माध्यम से, देश के कई सबसे संवेदनशील संस्थान 'Mythos AI' मॉडल का उपयोग कर सकेंगे। यह एक अत्यंत गोपनीय और अनरिलीज्ड तकनीक है, जिसे सॉफ्टवेयर की कमजोरियों को ऐसी गति और पैमाने पर खोजने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जो साइबर हमलों के खिलाफ सुरक्षा कवच को और अधिक मजबूत बना सकता है।
भारतीय कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (CERT-In), इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C), और नेशनल क्रिटिकल इंफॉर्मेशन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन सेंटर (NCIIPC) जैसे सरकारी संस्थान इसके मुख्य लाभार्थी हैं। सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री कार्यालय और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली ये एजेंसियां भारत के बैंकिंग, बिजली और दूरसंचार ग्रिड के सुरक्षा प्रोटोकॉल का परीक्षण करने के लिए विशेष रूप से इस एक्सेस की मांग कर रही थीं।
वैश्विक रक्षा प्रयासों का विस्तार
यह कदम 'प्रोजेक्ट ग्लासविंग' के रणनीतिक विस्तार को दर्शाता है, जिसे अब 15 देशों में लागू किया जा रहा है। हालांकि, दुरुपयोग की आशंकाओं के कारण शुरुआत में यह मॉडल केवल अमेरिका और ब्रिटेन तक सीमित था, लेकिन अब एंथ्रोपिक 'Mythos Preview' की पहुंच बढ़ा रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय विस्तार में यूरोपीय संघ की साइबर सुरक्षा एजेंसी (ENISA) भी शामिल है, जो यह संकेत देता है कि इस मॉडल को सक्रिय रूप से खतरों की पहचान करने के लिए एक वैश्विक मानक के रूप में स्थापित किया जा रहा है।
इतने शक्तिशाली टूल को साझा करने का निर्णय वैश्विक बाजारों में मची 'साइबर सुरक्षा की अफरा-तफरी' के बीच लिया गया है। हालांकि कुछ विश्लेषकों ने चिंता जताई है कि इस मॉडल की क्षमताएं अनजाने में दुनिया भर के कंप्यूटर सिस्टम की खामियों को उजागर कर सकती हैं, लेकिन जो टीमें पहले ही इसका उपयोग कर रही हैं, उनका मानना है कि इसकी असली ताकत प्रतिक्रिया की गति में है। इन विशेषज्ञों के लिए, कमजोरियों को तेजी से खोजने की क्षमता, इसके दुरुपयोग से जुड़े सैद्धांतिक जोखिमों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
नवाचार और बहिष्करण के बीच संतुलन
इस उत्साह के बावजूद, इसके क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियां भी हैं। वैश्विक टेक क्षेत्र की रिपोर्टों के अनुसार, जहां सरकारी एजेंसियों को इसका एक्सेस मिल रहा है, वहीं कुछ निजी क्षेत्र के तकनीकी प्रदाताओं ने शुरुआती चरणों में शामिल न किए जाने पर नाराजगी जताई है। इसके अलावा, प्रतिस्पर्धा भी बनी हुई है; जहां ब्रिटेन के बैंकिंग संस्थान OpenAI के GPT-5.5 की ओर रुख कर रहे हैं, वहीं यह स्पष्ट है कि देश और कंपनियां अपनी डिजिटल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न 'फ्रंटियर मॉडल्स' पर निर्भरता बढ़ा रहे हैं।
भारत में, सरकार के प्रयास केवल सरकारी एजेंसियों तक सीमित नहीं हैं। देश की प्रमुख आईटी सेवा कंपनियों की चुनिंदा साइबर सुरक्षा और अनुसंधान टीमों को भी इस मॉडल का एक्सेस देने पर विचार चल रहा है। इस सार्वजनिक-निजी सहयोग का उद्देश्य एक अधिक लचीला डिजिटल इकोसिस्टम तैयार करना है, ताकि भारत की आवश्यक सेवाओं को चलाने वाला सॉफ्टवेयर वैश्विक साइबर खतरों से हमेशा एक कदम आगे रहे।
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