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उल्टा चोर कोतवाल को डांटे: इस्लामाबाद की बयानबाजी पर नई दिल्ली का करारा जवाब

'अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न करने वाले हमें न सिखाएं', पाकिस्तानी राष्ट्रपति के बयान पर भारत का पलटवार

द्वारा अनन्या अय्यरप्रकाशित 21 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे: इस्लामाबाद की बयानबाजी पर नई दिल्ली का करारा जवाब
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे: इस्लामाबाद की बयानबाजी पर नई दिल्ली का करारा जवाब

भारत ने धार्मिक स्थलों को लेकर पाकिस्तानी राष्ट्रपति कार्यालय के हालिया दावों को मजबूती से खारिज कर दिया है। भारत ने इसे इस्लामाबाद द्वारा अपने खुद के मानवाधिकार रिकॉर्ड से ध्यान भटकाने की कोशिश करार दिया है।

नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच कूटनीतिक तल्खी एक बार फिर बढ़ गई है। यह तब हुआ जब Pakistan के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने भारत में ऐतिहासिक मुस्लिम धार्मिक स्थलों की स्थिति पर सवाल उठाने की कोशिश की। भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक आधिकारिक प्रतिक्रिया में इन टिप्पणियों को पूरी तरह से आधारहीन और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि इस्लामाबाद के पास भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने ब्रीफिंग के दौरान बिना किसी लाग-लपेट के पाकिस्तानी राष्ट्रपति की टिप्पणियों को 'हास्यास्पद' करार दिया। नई दिल्ली के लिए यह विडंबना स्पष्ट है: एक ऐसा देश जिसे वैश्विक संस्थाएं अपने ही धार्मिक अल्पसंख्यकों के व्यवस्थित उत्पीड़न के लिए अक्सर जिम्मेदार ठहराती हैं, वह अब विदेशों में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के रक्षक के रूप में खुद को पेश कर रहा है। जायसवाल ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस्लामाबाद से आ रही यह बयानबाजी कोई अलग घटना नहीं है, बल्कि यह असहिष्णुता और कट्टरता पर आधारित उनकी राज्य नीति का प्रतिबिंब है।

ध्यान भटकाने का पुराना तरीका

यह ताजा विवाद एक जाने-पहचाने पैटर्न का हिस्सा है। पिछले कई महीनों से, भारतीय प्रतिष्ठान इसे जानबूझकर ध्यान भटकाने की रणनीति के रूप में देख रहा है। चाहे वह अप्रैल 2025 में वक्फ (संशोधन) अधिनियम के खिलाफ की गई आलोचना हो या दिसंबर 2025 में अल्पसंख्यक अधिकारों के बारे में निराधार आरोप, यह पैटर्न लगातार बना हुआ है। जब भी पाकिस्तान के भीतर घरेलू दबाव बढ़ता है, भारत के आंतरिक शासन के खिलाफ बयानबाजी तेज हो जाती है।

जानकारों का मानना है कि ऐसे बयान अंतरराष्ट्रीय दर्शकों को प्रभावित करने के लिए दिए जाते हैं, लेकिन कूटनीतिक हलकों के बाहर इन्हें शायद ही कोई गंभीरता से लेता है। भारत द्वारा मनगढ़ंत बताए गए मुद्दों को बार-बार उठाकर इस्लामाबाद एक वैकल्पिक नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहा है, हालांकि इसका मुख्य परिणाम केवल नई दिल्ली के रुख का और सख्त होना रहा है। विदेश मंत्रालय का अपने पड़ोसी के लिए संदेश स्पष्ट है: एक कार्यशील और बहुलवादी लोकतंत्र पर उंगली उठाने से पहले अपने घर को दुरुस्त करें।

यह क्यों मायने रखता है

बड़ी तस्वीर यह है कि इस तरह के आदान-प्रदान के लिए अब कूटनीतिक स्तर पर कोई जगह नहीं बची है। भारत ने पाकिस्तान की अवांछित सलाह पर 'कोई बातचीत नहीं' की नीति अपना ली है। इन टिप्पणियों को 'निराधार और भ्रामक' बताकर, नई दिल्ली यह संकेत दे रही है कि वह अब इस्लामाबाद को अपनी घरेलू नीति पर एक विश्वसनीय टिप्पणीकार नहीं मानती है।

हालांकि भारत में राजनीतिक चर्चा अक्सर मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे नेताओं से जुड़ी हलचलों या aajtak जैसे आउटलेट्स द्वारा कवर किए जाने वाले व्यापक चुनावी घटनाक्रमों पर केंद्रित रहती है, लेकिन यह विशिष्ट कूटनीतिक विवाद दक्षिण एशियाई भू-राजनीति में बनी निरंतर तनातनी की याद दिलाता है। तमाम शोर-शराबे के बावजूद, भारत की रणनीति स्पष्ट है: हस्तक्षेप को खारिज करो, आरोप लगाने वाले के पाखंड को उजागर करो और घरेलू संप्रभुता पर ध्यान केंद्रित रखो। उम्मीद है कि आरोप-प्रत्यारोप का यह चक्र जारी रहेगा, लेकिन मौजूदा गतिरोध में किसी बदलाव की उम्मीद कम ही है।

द्वारा अनन्या अय्यर
वैश्विक मामले संवाददाता

अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।