नीति आयोग की 11वीं गवर्निंग काउंसिल बैठक: दिल्ली में राज्यों ने वित्तीय संघवाद पर जोर दिया
नीति आयोग की 11वीं गवर्निंग काउंसिल बैठक शुरू: मुख्यमंत्रियों ने की शिरकत
जैसे-जैसे मुख्यमंत्री 11वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक के लिए राष्ट्रीय राजधानी पहुंच रहे हैं, ध्यान सहकारी संघवाद और भारत के आर्थिक विकास के रोडमैप के बदलते स्वरूप पर केंद्रित हो गया है।
नई दिल्ली के सत्ता के गलियारे आज उस समय चर्चाओं से भर गए जब नीति आयोग ने अपनी 11वीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक बुलाई। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित इस उच्च-स्तरीय बैठक में मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल 2047 तक 'विकसित भारत' के रोडमैप पर विचार-विमर्श कर रहे हैं। हालांकि आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से डिजिटल सत्यापन की प्रक्रिया को पूरा करने में कर्मचारियों को कुछ पल का समय लग रहा है, लेकिन असली चुनौती बैठक के भीतर है: क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय वित्तीय प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाना।
इन बैठकों का मूल उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच संवाद को बढ़ावा देना है, ताकि दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर संरचनात्मक आर्थिक बदलावों पर चर्चा की जा सके। प्रजाशक्ति जैसे समाचार माध्यमों की हालिया रिपोर्टों में इस बात पर जोर दिया गया है कि संसाधन आवंटन और बुनियादी ढांचे के विकास की बाधाओं को दूर करने के लिए यह सत्र महत्वपूर्ण है। चूंकि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की सुरक्षा व्यक्तिगत राज्यों के प्रदर्शन से जुड़ी है, इसलिए उम्मीद है कि चर्चा तीखी होगी, विशेष रूप से केंद्र प्रायोजित योजनाओं और सहायता अनुदान तंत्र को लेकर।
संघीय घर्षण
चर्चा केवल नीतिगत प्रस्तुतियों तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। तेलंगाना जैसे राज्यों के लिए, दांव पर प्रमुख सिंचाई और शहरी विकास परियोजनाओं के लिए प्रतिबद्धताएं हासिल करना है, जिसके लिए निरंतर केंद्रीय समर्थन की आवश्यकता है। गवर्निंग काउंसिल एक प्रमुख मंच के रूप में कार्य करती है जहां ऐसी राज्य-विशिष्ट शिकायतें राष्ट्रीय नीतिगत ढांचे से मिलती हैं। पिछले वर्षों के विपरीत, अधिक वित्तीय स्वायत्तता की मांग एक आवर्ती विषय बन गई है, जिसमें कई राज्य केंद्रीय निधियों के आवंटन के लिए अधिक लचीले दृष्टिकोण की मांग कर रहे हैं।
नीति आयोग की गवर्निंग बॉडी को सहकारी संघवाद का केंद्र बिंदु बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। हालांकि, इन बैठकों की प्रभावशीलता अक्सर औद्योगिक गलियारों के लिए केंद्र के दृष्टिकोण और राज्यों की जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन क्षमता के बीच तालमेल पर निर्भर करती है। आज की बैठक केवल पिछले मील के पत्थरों की समीक्षा के बारे में नहीं है; यह अगले वित्तीय वर्ष के लिए दिशा तय करने के बारे में है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नीति कार्यान्वयन नौकरशाही की बाधाओं में न खो जाए।
यह क्यों मायने रखता है
यहां बड़ी तस्वीर नीति आयोग का एक योजना निकाय से एक नीति थिंक-टैंक में परिवर्तन है, जिसे एक विविध संघीय संघ की जटिल मांगों के बीच मध्यस्थता करनी है। इन परिषदों से उभरता पैटर्न बताता है कि राज्य तेजी से राष्ट्रीय विकास के प्राथमिक इंजन के रूप में अपनी भूमिका पर जोर दे रहे हैं। यदि केंद्र मुख्यमंत्रियों द्वारा उठाए गए संसाधन संबंधी चिंताओं को प्रभावी ढंग से संबोधित कर सकता है, तो इससे राष्ट्रीय आर्थिक प्रदर्शन में बेहतर तालमेल हो सकता है। इसके विपरीत, यदि ये बैठकें केवल औपचारिक बनी रहीं, तो राज्य-स्तरीय जरूरतों और केंद्रीय जनादेश के बीच की खाई और चौड़ी हो जाएगी, जिससे दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे और सामाजिक क्षेत्र के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।