NIA कोर्ट ने 2018 पंजाब आतंकी साजिश मामले में तीन दोषियों को सुनाई सजा
NIA कोर्ट ने 2018 पंजाब आतंकी साजिश मामले में 3 लोगों को दोषी करार दिया और सजा सुनाई
मोहाली की एक विशेष अदालत ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन के लिए राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश रचने के दोषी तीन लोगों को कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
मोहाली की एक विशेष NIA अदालत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाई पूरी करते हुए, 2018 की आतंकी साजिश में अपनी भूमिका के लिए तीन व्यक्तियों को अलग-अलग अवधि के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। यह फैसला प्रतिबंधित संगठन अंसार गज़वत-उल-हिंद (AGH) से जुड़ी एक साजिश की व्यापक जांच का परिणाम है, जिसका उद्देश्य छात्रों को भर्ती करना और पंजाब में अपनी जड़ें जमाना था।
फैसला और सजा
64 गवाहों की गवाही वाले मुकदमे के बाद, अदालत ने जाहिद गुलज़ार, यासिर रफीक भट और मोहम्मद इदरीस शाह को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, शस्त्र अधिनियम और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत गंभीर आरोपों में दोषी ठहराया। तीनों दोषियों को अलग-अलग सजा सुनाई गई है, जिसमें कुछ को 10 साल तक के कठोर कारावास की सजा मिली है। अदालत ने सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के स्पष्ट इरादे से हथियार और विस्फोटक इकट्ठा करने से संबंधित आरोपों पर भी गौर किया। हालांकि तीन आरोपियों को दोषी ठहराया गया, लेकिन अदालत ने चौथे व्यक्ति सुहैल अहमद भट को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।
जांच की शुरुआत
यह मामला पहली बार अक्टूबर 2018 में सामने आया जब पंजाब पुलिस ने जालंधर के शाहपुर स्थित सीटी इंस्टीट्यूट के हॉस्टल में तलाशी ली। इस कार्रवाई के दौरान, अधिकारियों ने आरोपियों के कमरे से हथियारों और खतरनाक सामग्रियों का जखीरा बरामद किया। जब्त की गई वस्तुओं में एक AK-56 राइफल, कई मैगजीन, 80 से अधिक जिंदा कारतूस, एक मौसर पिस्तौल और लगभग एक किलोग्राम विस्फोटक सामग्री शामिल थी।
प्रारंभिक पुलिस कार्रवाई के बाद, केंद्र सरकार ने नवंबर 2018 में मामले को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंप दिया। अगले कुछ वर्षों में, जांचकर्ताओं ने आरोपियों को AGH से जोड़ने के लिए इलेक्ट्रॉनिक, फोरेंसिक और दस्तावेजी सबूत जुटाए। जांच में खुलासा हुआ कि समूह को फंडिंग मिल रही थी और वे संगठन के उग्रवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए साथी छात्रों को कट्टरपंथी बनाने की कोशिश कर रहे थे।
एक समन्वित कानूनी प्रयास
यह सफल अभियोजन पंजाब पुलिस और केंद्रीय एजेंसी के बीच सहयोगात्मक प्रयासों का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। सजा सुनाकर, अदालत ने प्रभावी रूप से उस मामले के एक अध्याय को बंद कर दिया है जिसने राज्य में शैक्षणिक वातावरण की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी थीं। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा के रहने वाले तीनों दोषी 2018 में अपनी गिरफ्तारी के बाद से ही न्यायिक हिरासत में थे। यह फैसला आतंकी साजिशों में शामिल लोगों के प्रति न्याय प्रणाली के सख्त रुख की याद दिलाता है।
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