नाशिक विधान परिषद चुनाव: महायुति में खटपट, क्रॉस-वोटिंग की चर्चाओं ने बढ़ाई चिंता
नाशिक विधान परिषद: महायुतीत बिघडलं? भाजप-शिवसेनेत ‘क्रॉस व्होटिंग’ची चर्चा!
नाशिक विधान परिषद चुनाव के नतीजों पर क्रॉस-वोटिंग और स्थानीय स्तर पर हुई भीतरघात की खबरों ने बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की एकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नाशिक में हाई-प्रोफाइल विधान परिषद चुनाव के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म है। 99.84% मतदान—यानी 619 में से 618 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया—के बावजूद सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन की बेचैनी कम नहीं हुई है। यह चुनाव शिंदे-फडणवीस-अजित पवार गठबंधन के लिए शक्ति प्रदर्शन का जरिया माना जा रहा था, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि निर्दलीय उम्मीदवार गोकुल गीते को बीजेपी के प्रभावशाली नेताओं और यहां तक कि एक शिवसेना विधायक का भी गुप्त समर्थन मिला, जिससे चुनाव के बाद गठबंधन में बड़े विवाद के आसार बन गए हैं।
बगावत की परतें
यह चुनाव शुरू से ही आंतरिक असंतोष से घिरा रहा। उद्योग मंत्री उदय सामंत को बागी नेताओं, जिनमें प्रसाद हिरे और पूर्व स्थायी समिति अध्यक्ष गणेश गीते के भाई गोकुल गीते शामिल थे, को मनाने के लिए कई बार नाशिक के दौरे करने पड़े। हालांकि हिरे अंततः महायुति के उम्मीदवार नरेंद्र दराडे के साथ आ गए, लेकिन गोकुल गीते का सक्रिय प्रचार से 'पीछे हटना'—पर उम्मीदवारी वापस न लेना—शिंदे खेमे के लिए गहरे संदेह का विषय बन गया।
मतदान की पूर्व संध्या पर स्थिति तब और बिगड़ गई जब सोशल मीडिया पर 'डमी' मतपत्र वायरल होने लगे, जिनमें गोकुल गीते को पहली प्राथमिकता देने की अपील की गई थी। बताया जा रहा है कि शिंदे गुट के एक वरिष्ठ मंत्री ने उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को इस संगठित भीतरघात के बारे में आगाह किया था, जिसमें स्थानीय बीजेपी नेताओं की ओर इशारा किया गया, जो दराडे को टिकट मिलने से खुद को दरकिनार महसूस कर रहे थे।
रणनीतिक भीतरघात या स्वतंत्र महत्वाकांक्षा?
मंत्री गिरीश महाजन के साथ गणेश गीते की नजदीकियों ने इन आरोपों को और जटिल बना दिया है। शीर्ष नेतृत्व के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, मतदान के दिन पोलिंग बूथों के पास गीते बंधुओं की मौजूदगी ने इस अफवाह को हवा दी कि आधिकारिक उम्मीदवार को हराने के लिए सुनियोजित प्रयास किए गए।
जब गोकुल गीते से सवाल किया गया, तो उन्होंने दावा किया कि गठबंधन धर्म का पालन करते हुए उन्होंने सभी चुनावी गतिविधियां बंद कर दी थीं। हालांकि, उनका यह रहस्यमयी बयान कि 'अगर उन्हें एमवीए या ठाकरे गुट से वोट मिलते हैं, तो वे मतदाताओं की मंशा के लिए जिम्मेदार नहीं हैं', शिंदे खेमे को आश्वस्त करने में नाकाम रहा। इस बयानबाजी ने स्थानीय नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है, जिन्हें डर है कि अंतिम परिणाम एकतरफा जीत के बजाय सोची-समझी गद्दारी की कहानी न बयां करें।
यह क्यों मायने रखता है: व्यापक तस्वीर
यह घटना केवल स्थानीय गुटबाजी से कहीं अधिक है; यह जमीनी स्तर पर महायुति गठबंधन के नाजुक ढांचे को उजागर करती है। जब क्षेत्रीय नेता गठबंधन के निर्देशों के ऊपर अपने स्थानीय प्रभाव और पारिवारिक हितों को प्राथमिकता देते हैं, तो यह सत्ता-साझेदारी के भीतर वर्चस्व की एक गहरी लड़ाई का संकेत है। जैसा कि एबीपी माझा के एक लेख में चर्चा की गई है, ऐसी घटनाएं अलग-अलग पार्टी कैडरों को एक वफादार वोट बैंक में बदलने की चुनौती को रेखांकित करती हैं। राज्य नेतृत्व के लिए अब मुख्य चुनौती सिर्फ विपक्ष नहीं, बल्कि 'फ्रेंडली फायर' है, जो अगले बड़े चुनावी चक्र से पहले गठबंधन की विश्वसनीयता को कमजोर कर रहा है। यदि क्रॉस-वोटिंग की ये खबरें अंतिम नतीजों में सच साबित होती हैं, तो बीजेपी और शिवसेना को एकजुट चेहरा बनाए रखने के लिए कठिन आत्ममंथन करना होगा।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।