सिर्फ एक यात्रा दस्तावेज नहीं: भारतीय नागरिकता को लेकर क्या कहता है कानून?
सरकार ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है; इसके लिए पासपोर्ट अधिनियम और 2013 के बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले का दिया हवाला
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि भारतीय पासपोर्ट का होना नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है, और इसके लिए लंबे समय से चले आ रहे कानूनी ढांचे का हवाला दिया है।
विदेश मंत्रालय (MEA) ने इस सप्ताह यह कहकर एक तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी कि भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज है। सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस के बीच, सरकार ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि यह कोई नई नीति नहीं है, बल्कि एक कानूनी वास्तविकता है जो दशकों से लागू है। इस मामले का मुख्य बिंदु यात्रा की अनुमति देने वाले दस्तावेज और नागरिकता के दर्जे के बीच का अंतर है।
कानूनी स्थिति
सरकार का रुख पासपोर्ट अधिनियम, 1967 पर आधारित है। विशेष रूप से, अधिनियम की धारा 20 केंद्र को यह अधिकार देती है कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है जो भारतीय नागरिक नहीं है, यदि इसे 'जनहित' में माना जाए। इस प्रावधान का हवाला देकर, सरकार यह रेखांकित कर रही है कि पासपोर्ट जारी करना यात्रा को सुविधाजनक बनाने के लिए एक प्रशासनिक कार्य है, न कि राष्ट्रीयता का कोई अंतिम प्रमाण पत्र।
यह पहली बार नहीं है जब इस व्याख्या को परखा गया है। प्रशासन ने 2013 के बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले का उल्लेख किया है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि पासपोर्ट का होना नागरिकता स्थापित नहीं करता है। कानूनी विशेषज्ञों और भाजपा नेता अमित मालवीय सहित सरकारी प्रतिनिधियों ने दोहराया है कि भारत में नागरिकता का निर्धारण नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत होता है, जिसके लिए विशिष्ट पात्रता मानदंड और सहायक साक्ष्यों की आवश्यकता होती है।
राजनीतिक घमासान
इस स्पष्टीकरण ने विपक्ष को नया मुद्दा दे दिया है। राज्यसभा सांसद कपिल सिबल ने सोशल मीडिया पर विदेश मंत्रालय के बयान के निहितार्थों पर सवाल उठाते हुए पूछा कि फिर कौन सा दस्तावेज नागरिकता का अंतिम प्रमाण माना जाएगा। यह बहस स्वाभाविक रूप से चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी चिंताओं तक पहुंच गई है, जहां यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस तरह के अंतर नौकरशाही सत्यापन के दौरान वोटर आईडी या अन्य पहचान पत्रों की वैधता को प्रभावित कर सकते हैं। असदुद्दीन ओवैसी जैसे अन्य नेताओं ने भी इस मौके का उपयोग सरकार की पहचान और दस्तावेजों के प्रति व्यापक दृष्टिकोण की आलोचना करने के लिए किया है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह कानूनी बारीकियों और पहचान की सार्वजनिक धारणा के बीच टकराव का एक क्लासिक मामला है। आम नागरिक के लिए, पासपोर्ट अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए पहचान का सबसे मजबूत रूप है, जिससे यह स्वीकार करना मुश्किल हो जाता है कि कानून की नजर में यह उनकी नागरिकता को 'साबित' नहीं करता है।
हालांकि, यहां बड़ी तस्वीर दस्तावेजों के मानकों पर राज्य की बढ़ती पकड़ है। अदालत के फैसलों और 1967 के अधिनियम का लगातार हवाला देकर, केंद्र एक अधिक कठोर, साक्ष्य-आधारित नागरिकता सत्यापन व्यवस्था की ओर बढ़ने का संकेत दे रहा है। जैसे-जैसे पहचान दस्तावेजों पर बहस तेज हो रही है, 'यात्रा प्राधिकरण' और 'कानूनी राष्ट्रीयता' के बीच का अंतर देश के अधिकारों और नागरिकता पर होने वाली व्यापक चर्चा में एक बार-बार उभरने वाला मुद्दा बन सकता है।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।