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मानसून की सुस्त चाल: भारत में बारिश की कमी से कृषि क्षेत्र में चिंता

भारत के लिए बुरी खबर, मानसून की रफ्तार धीमी; बारिश में 28 फीसदी की कमी

द्वारा प्रिया नायरप्रकाशित 15 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
मानसून की सुस्त चाल: भारत में बारिश की कमी से कृषि क्षेत्र में चिंता
मानसून की सुस्त चाल: भारत में बारिश की कमी से कृषि क्षेत्र में चिंता

जैसे-जैसे मानसून की प्रगति में 28% की कमी आ रही है, देरी से आगमन और स्थानीय स्तर पर चरम मौसमी घटनाओं के बीच का अंतर भारत की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक अस्थिर मौसम की ओर इशारा कर रहा है।

मानसून का आगमन भारत की सूखी धरती के लिए जीवनदायिनी माना जाता है, लेकिन भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के नवीनतम आंकड़े एक गंभीर वास्तविकता पेश कर रहे हैं। 4 जून से 14 जून के बीच, देश में 47.7 मिमी की दीर्घकालिक औसत के मुकाबले केवल 34.3 मिमी बारिश दर्ज की गई। यह 28% की कमी केवल आंकड़ों में गिरावट नहीं है; यह वायुमंडलीय चक्र के बाधित होने का संकेत है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि पश्चिमी जेट स्ट्रीम का सामान्य से अधिक दक्षिण की ओर खिसकना बारिश की धीमी शुरुआत का मुख्य कारण है।

दो भारत की कहानी: सूखा और जलप्रलय

हालांकि मानसून का शुरुआती चरण कमजोर रहा है, लेकिन देश एक अनिश्चित जलवायु पैटर्न से जूझ रहा है। जहां देश का एक बड़ा हिस्सा लगातार बारिश का इंतजार कर रहा है, वहीं राजस्थान, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर जैसे क्षेत्र स्थानीय स्तर पर तीव्र मौसम की मार झेल रहे हैं। राजस्थान में, विशेष रूप से कोटा और बूंदी जैसे जिलों में स्थिति विकट हो गई है; कुछ इलाकों में 24 घंटे में 502 मिमी तक बारिश दर्ज की गई, जिससे संगमेश्वर मंदिर जैसे ऐतिहासिक स्थल जलमग्न हो गए और गांव अलग-थलग पड़ गए।

इस बीच, शहरी केंद्र अचानक आए पानी के सैलाब से निपटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मुंबई में गांधी मार्केट और ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर गंभीर जलभराव हुआ है, और गुरुग्राम में पूरे इलाके जलमग्न हैं। यह विरोधाभास—राष्ट्रीय स्तर पर बारिश की कमी और साथ में स्थानीय बाढ़—प्रशासन और आपदा प्रतिक्रिया टीमों को लगातार सतर्क रहने पर मजबूर कर रहा है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

IMD द्वारा मौसमी बारिश के पूर्वानुमान को दीर्घकालिक औसत के 92% से घटाकर 90% करना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए काफी मायने रखता है। ऐसे देश में जहां कृषि क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा बारिश पर निर्भर है, मानसून का लड़खड़ाना एक प्रणालीगत जोखिम है जो भूगोल की सीमाओं से परे है। जम्मू में भूस्खलन या उत्तर प्रदेश में पुल गिरने से होने वाली तत्काल बाधाओं के अलावा, व्यापक चिंता खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण क्रय शक्ति पर पड़ने वाले प्रभाव की है। जब बारिश अपनी गति नहीं पकड़ पाती, तो फसल चक्र में अस्थिरता अक्सर महंगाई का रूप ले लेती है, जो आबादी के सबसे कमजोर वर्गों को सबसे पहले प्रभावित करती है।

आगे की राह

जलवायु का परिदृश्य जटिल बना हुआ है। हालांकि आंकड़ों का वर्तमान चेकहिस्ट्री (इतिहास) एक धीमी शुरुआत का संकेत देता है, लेकिन विशेषज्ञों को 20 जून के बाद गतिशीलता में बदलाव की उम्मीद है। पूर्वानुमान बताते हैं कि पूर्वी हवाओं के मजबूत होने की संभावना है, जो बंगाल की खाड़ी से नमी वाली प्रणालियों को भारतीय मुख्य भूमि में गहराई तक खींच सकती हैं। क्या यह बदलाव 28% की कमी को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगा, यह आने वाले हफ्तों के लिए सबसे बड़ा सवाल है। फिलहाल, कृषि और फैक्ट-चेक समुदाय सावधानी भरी उम्मीद और गहरी चिंता के साथ आसमान की ओर देख रहे हैं, यह जानते हुए कि मानसून का यह रुख साल के बाकी हिस्सों के लिए देश के वित्तीय और सामाजिक स्वास्थ्य को तय करेगा।

द्वारा प्रिया नायर
राजनीतिक संवाददाता

प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।