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महाराष्ट्र के नए RTI नियमों पर मचा बवाल, पारदर्शिता पर हमले की आशंका

महाराष्ट्र के नए RTI नियमों पर मचा बवाल, पारदर्शिता पर हमले की आशंका

द्वारा रोहन गुप्ताप्रकाशित 18 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
महाराष्ट्र के नए RTI नियमों पर मचा बवाल और पारदर्शिता पर हमले की आशंका
महाराष्ट्र के नए RTI नियमों पर मचा बवाल और पारदर्शिता पर हमले की आशंका

राज्य के सूचना कानूनों में प्रस्तावित बदलाव, जिसमें नागरिकता का अनिवार्य प्रमाण और उच्च शुल्क शामिल हैं, ने कार्यकर्ताओं के बीच हड़कंप मचा दिया है। उनका मानना है कि इससे सरकारी जवाबदेही का दायरा और सिमट जाएगा।

सूचना का अधिकार (RTI) आंदोलन, जिसे कभी महाराष्ट्र में सबसे मजबूत माना जाता था, आज एक प्रणालीगत संकट का सामना कर रहा है। राज्य सरकार RTI नियमों में विवादास्पद बदलाव कर रही है—जिसमें नागरिकता का प्रमाण, पूछताछ का उद्देश्य बताना और आवेदन शुल्क में बढ़ोतरी शामिल है। आलोचकों का तर्क है कि ये कदम केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि पारदर्शिता पर सीधा हमला हैं, जो सत्ता को जवाबदेह बनाने वाले कानून की प्रभावशीलता को खत्म कर सकते हैं।

दबाव में व्यवस्था

इन बदलावों का समय बेहद संवेदनशील है। राज्य का पारदर्शिता ढांचा पहले से ही 98,000 से अधिक लंबित अपीलों और शिकायतों के बोझ तले दबा हुआ है। सालों से इस व्यवस्था से जूझ रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि 2021 के मामलों की सुनवाई अब हो रही है। जब तक सुनवाई होती है, अधिकारी या तो स्थानांतरित हो जाते हैं या सेवानिवृत्त, जिससे जवाबदेही तय करना लगभग असंभव हो जाता है। संतोष जाधव जैसे नागरिकों के लिए, जिन्होंने हाल ही में 'लाड़की बहिन योजना' पर जानकारी मांगी थी, यह एक "दुष्चक्र" जैसा है, जहाँ RTI का स्टेटस जानने के लिए फिर से RTI लगानी पड़ती है और महीनों या सालों तक कोई जवाब नहीं मिलता।

जानकारी की कीमत

शुल्क बढ़ाने और आवेदनों के लिए स्पष्टीकरण मांगने के सरकारी फैसले की नागरिक समाज ने कड़ी आलोचना की है। लगभग दो दशकों तक, RTI अधिनियम इस सिद्धांत पर काम करता था कि नागरिक को सार्वजनिक खर्च की जांच के लिए अपना मकसद बताने की जरूरत नहीं है। आलोचकों का कहना है कि आवेदकों को कारण बताने के लिए मजबूर करके, सरकार "मकसद की जांच" का एक ऐसा हथियार बना रही है जो व्हिसलब्लोअर्स को डरा सकता है और अधिकारियों को मनमाने ढंग से आवेदन खारिज करने का बहाना दे सकता है। इसके अलावा, नागरिकता प्रमाण की अनिवार्यता को एक "गैर-जरूरी बाधा" के रूप में देखा जा रहा है, जो गरीब और हाशिए पर रहने वाले समूहों को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगी।

बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है

यह हालिया कदम शासन में एक व्यापक और चिंताजनक प्रवृत्ति को दर्शाता है, जहाँ "कार्यकुशलता" के नाम पर जानने के अधिकार को सीमित किया जा रहा है। हालाँकि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने आंतरिक विचार-विमर्श की सुरक्षा के लिए अधिनियम की "पुनः समीक्षा" का सुझाव दिया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता बेहतर नीति के लिए उत्प्रेरक है, बाधा नहीं। राज्य का यह स्वीकार करना कि उसका ऑनलाइन पोर्टल "सीमित सर्वर क्षमता" के कारण एक दशक से अधिक समय से बंद था—और मीडिया के दबाव के बाद ही सक्रिय हुआ—प्रशासन की लापरवाही को दर्शाता है। जब तकनीकी खामियों और जटिल नियमों का उपयोग ढाल के रूप में किया जाता है, तो RTI का लोकतांत्रिक सुरक्षा कवच निष्प्रभावी हो जाता है।

सुधार या प्रतिगमन का रास्ता?

यह बहस अब केवल प्रक्रियात्मक असहमति से आगे बढ़ गई है। जहाँ सरकार का दावा है कि ये बदलाव व्यवस्था को "भविष्य के लिए तैयार" करने के लिए हैं, वहीं कार्यकर्ता इसे सार्वजनिक जांच के दायरे को सिकोड़ने की कोशिश मान रहे हैं। यदि राज्य पारदर्शिता के बजाय गोपनीयता को प्राथमिकता देना जारी रखता है, तो यह ऐतिहासिक कानून केवल नाम का रह जाएगा। विश्वास बहाल करने के लिए, पारदर्शिता के पैरोकार अधिक सूचना आयुक्तों की नियुक्ति और एक मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचे की मांग कर रहे हैं, न कि ऐसी नई बाधाओं की जो सवाल पूछने की प्रक्रिया को महंगा और कठिन बना दें।

द्वारा रोहन गुप्ता
बिज़नेस संवाददाता

रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।