केरल का 'एज-केयर मॉडल' नीति आयोग में चर्चा का केंद्र
वयोवृद्ध कल्याण विभाग: नीति आयोग की बैठक में प्रधानमंत्री ने की केरल की सराहना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुजुर्गों के लिए केरल के समर्पित विभाग की सराहना की है, जो देश भर में राज्य-स्तरीय सामाजिक सुरक्षा मॉडल के लिए एक मानक स्थापित कर रहा है।
हाल ही में नीति आयोग की एक उच्च-स्तरीय बैठक में, चर्चा का विषय बुनियादी ढांचे के व्यापक लक्ष्यों से हटकर बढ़ती उम्र की आबादी की ज्वलंत और अक्सर अनदेखी की जाने वाली वास्तविकता पर केंद्रित रहा। चर्चा के दौरान, वृद्धावस्था देखभाल के प्रति केरल के सक्रिय प्रशासनिक दृष्टिकोण को प्रधानमंत्री से विशेष सराहना मिली। बुजुर्गों के कल्याण के लिए एक समर्पित विभाग की स्थापना करके, राज्य ने बिखरी हुई सामाजिक योजनाओं से आगे बढ़कर समर्थन के एक अधिक संरचनात्मक और संस्थागत स्वरूप को अपनाया है।
सामाजिक कल्याण में एक संरचनात्मक बदलाव
वर्षों तक, तिरुवनंतपुरम से लेकर कासरगोड के सुदूर उत्तरी छोर तक के बुजुर्गों की जरूरतों को मुख्य रूप से पेंशन योजनाओं या स्वैच्छिक पहलों के माध्यम से पूरा किया जाता था। हालाँकि, केरल एक अनूठे जनसांख्यिकीय बदलाव से गुजर रहा है। जीवन प्रत्याशा दर राष्ट्रीय औसत से लगातार अधिक होने के कारण, राज्य के स्वास्थ्य सेवा परिदृश्य को तेजी से विकसित होना पड़ा है।
एक विशेष विभाग का निर्माण सेवाओं को केंद्रीकृत करने के एक सोचे-समझे प्रयास को दर्शाता है। चाहे वह अकेलेपन को दूर करना हो, चिकित्सा पहुंच हो, या सामाजिक सुरक्षा, राज्य की प्रशासनिक प्राथमिकता में अब बुजुर्ग आबादी शासन का एक मुख्य स्तंभ है। यह केवल वित्तीय सहायता के बारे में नहीं है; यह एक ऐसा ढांचा तैयार करने के बारे में है जो जीवन के अंतिम पड़ाव में मौजूद लोगों की विशिष्ट जैविक और सामाजिक कमजोरियों को पहचानता है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: व्यापक परिप्रेक्ष्य
केंद्र सरकार द्वारा यह मान्यता महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संकेत देती है कि आने वाले दशक में भारतीय राज्य सामाजिक कल्याण के प्रति अपने दृष्टिकोण में बदलाव ला सकते हैं। जैसे-जैसे देश एक ऐसे जनसांख्यिकीय प्रोफाइल की ओर बढ़ रहा है जहां बुजुर्ग आबादी में काफी वृद्धि होगी, समर्पित वृद्धावस्था शासन का 'केरल मॉडल' एक खाका पेश करता है।
यह बताता है कि एर्नाकुलम के औद्योगिक केंद्रों से लेकर इडुक्की के पहाड़ी इलाकों और अलाप्पुझा, कोल्लम और पथानामथिट्टा के तटीय क्षेत्रों तक, राज्यों को जल्द ही इस संस्थागत फोकस को दोहराने की आवश्यकता हो सकती है। जब कोई राज्य बुजुर्गों को विशिष्ट विभागीय आवश्यकताओं वाले एक अलग वर्ग के रूप में देखता है, तो इससे प्रशासनिक बाधाएं कम होती हैं जो अक्सर वरिष्ठ नागरिकों को नौकरशाही की परतों में उलझाए रखती हैं। यह इस बात की स्वीकृति है कि तेजी से बदलती दुनिया में, बुजुर्गों की गरिमा कोई विलासिता नहीं, बल्कि राज्य की विकास सफलता का एक मूलभूत पैमाना है।
सुर्खियों से परे
हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर मिली यह सराहना एक मील का पत्थर है, लेकिन असली परीक्षा वायनाड या कोट्टायम जैसे विविध जिलों में इन नीतियों के क्रियान्वयन में निहित है। प्रशासनिक मंशा एक बात है, लेकिन यह सुनिश्चित करना कि ये सेवाएं राज्य के सबसे दूरदराज के कोनों तक पहुंचें, वही वह जगह है जहां दीर्घकालिक प्रभाव को मापा जाएगा। फिलहाल, यह कदम एक समयोचित अनुस्मारक के रूप में कार्य करता है कि जैसे-जैसे हम तकनीकी और आर्थिक विकास के पीछे भाग रहे हैं, हमारे सबसे कमजोर नागरिकों का समर्थन करने वाली प्रणालियों को भी उसी गति से चलना चाहिए।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।