कर्नाटक बीजेपी में आंतरिक कलह: एस.टी. सोमशेखर ने शोभा करंदलाजे पर साधा निशाना
इस पूरे बवाल की जड़ शोभा करंदलाजे हैं: उन्हें धर्मस्थल में शपथ लेनी चाहिए; एस.टी. सोमशेखर
विधान परिषद चुनाव के बाद मचे सियासी घमासान के बीच तोड़फोड़ के आरोप और धर्मस्थल में 'दिव्य परीक्षा' की मांग ने हलचल तेज कर दी है।
कर्नाटक विधान परिषद चुनाव के बाद राज्य की राजनीति का पारा चढ़ गया है। क्रॉस-वोटिंग के आरोपों ने राज्य बीजेपी इकाई के भीतर की गहरी दरारों को उजागर कर दिया है। विधायक एस.टी. सोमशेखर ने केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे पर पार्टी के भीतर की अराजकता का मास्टरमाइंड होने का सार्वजनिक आरोप लगाया है। उन्होंने मांग की है कि शोभा करंदलाजे अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए धर्मस्थल मंदिर में जाकर सार्वजनिक शपथ लें।
ये आरोप इस संदेह पर केंद्रित हैं कि पार्टी के ही सदस्यों ने चुनाव में तोड़फोड़ की, जिससे राज्य नेतृत्व मुश्किल में पड़ गया है। सोमशेखर का दावा है कि बी.वाई. विजयेंद्र और आर. अशोक के गुटों के बीच चल रही आपसी खींचतान ने भरोसे का संकट पैदा कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि नेता सक्रिय रूप से एक-दूसरे के उम्मीदवारों को कमजोर करने में लगे हैं, जिसके कारण क्रॉस-वोटिंग की शर्मनाक घटना हुई, जो अब गहन जांच का केंद्र बन गई है।
सार्वजनिक शपथ की मांग
सोमशेखर की 'धर्मस्थल ट्रायल' की मांग पार्टी में एकता की कमी पर एक करारा प्रहार है। उन्होंने तर्क दिया कि आंतरिक जांच करने के बजाय, शीर्ष नेतृत्व को पवित्र स्थल पर जाकर खुद को बेदाग साबित करना चाहिए। करंदलाजे को निशाना बनाकर सोमशेखर ने विवाद को और बढ़ा दिया है। उनका दावा है कि विजयेंद्र और अशोक के प्रति करंदलाजे की व्यक्तिगत दुश्मनी ने पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया है।
यह केवल एक चुनाव परिणाम का मामला नहीं है, बल्कि गिरते आंतरिक अनुशासन का संकेत है। हालांकि बीजेपी इस उल्लंघन को लेकर एक रिपोर्ट तैयार कर रही है, लेकिन सोमशेखर का खुला विद्रोह बताता है कि यह मतभेद केवल मतदान तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि विकास अनुदान के लिए उनका समर्थन स्पष्ट और पारदर्शी था, और उन्होंने चेतावनी दी कि यदि उन्हें उकसाया गया तो वह चुप नहीं बैठेंगे।
यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर
यह सार्वजनिक विवाद राज्य-स्तरीय राजनीति के उस दौर को दर्शाता है जहां व्यक्तिगत अहंकार और गुटीय वफादारी पार्टी के जनादेश पर हावी हो जाती है। जब वरिष्ठ नेता राजनीतिक संकट के बीच धार्मिक शपथ लेने की मांग करते हैं, तो यह पार्टी के पारंपरिक मध्यस्थता तंत्र के विफल होने का संकेत है।
बीजेपी के लिए चुनौती अब केवल बाहरी विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने उस कैडर को संभालने की है जो सार्वजनिक मंचों पर अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए स्वतंत्र महसूस कर रहा है। यदि पार्टी इन परस्पर विरोधी केंद्रों के बीच सुलह कराने में विफल रहती है, तो आने वाले समय में 'अनुशासित पार्टी' की उसकी छवि और धूमिल हो सकती है।
इस रिपोर्ट के स्रोतों में kannadaprabha.com का प्राथमिक विवरण और शिल्पा डी. द्वारा अपडेट की गई कवरेज शामिल है। इस कहानी के ताजा अपडेट के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।