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है जवानी तो इश्क होना है रिव्यू: वरुण धवन की नई फिल्म उम्मीद के मुताबिक ही 'अराजकता' परोसती है

है जवानी तो इश्क होना है रिव्यू | वरुण धवन की फिल्म उम्मीद के मुताबिक ही 'अराजकता' परोसती है

द्वारा पॉलिटिकलपीडिया संपादकीय डेस्कप्रकाशित 5 जून 2026· 3 मिनट पढ़ें
है जवानी तो इश्क होना है रिव्यू: वरुण धवन की नई फिल्म उम्मीद के मुताबिक ही अराजकता परोसती है
है जवानी तो इश्क होना है रिव्यू: वरुण धवन की नई फिल्म उम्मीद के मुताबिक ही अराजकता परोसती है

निर्देशक डेविड धवन अपनी सिग्नेचर स्लैपस्टिक कॉमेडी के साथ वापस आए हैं। यह फिल्म पूरी तरह से अजीबोगरीब गलतफहमियों और हंसी-मजाक पर आधारित है।

सिनेमाई दुनिया में अक्सर हल्की-फुल्की और बिना किसी तामझाम वाली कॉमेडी फिल्मों के लिए जगह होती है, और है जवानी तो इश्क होना है इसी उद्देश्य के साथ आई है। डेविड धवन की यह फिल्म गंभीर ड्रामा से दूर, एक ऐसी कहानी है जहाँ तर्क के बजाय स्थितियों से पैदा होने वाली कॉमेडी को प्राथमिकता दी गई है। अनुभवी निर्देशक की शैली के प्रशंसकों के लिए, यह है जवानी तो इश्क होना है रिव्यू बताता है कि फिल्म एक क्लासिक 'कॉमेडी-ऑफ-एरर्स' है जो अपनी कमर्शियल जड़ों से मजबूती से जुड़ी हुई है।

फॉर्मूले पर आधारित कहानी

कहानी जस (वरुण धवन) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी निजी जिंदगी उलझनों के भंवर में फंस जाती है। फिल्म में जस और उसकी पत्नी बनी (मृणाल ठाकुर) के बीच के तनाव को दिखाया गया है, जो अपने भविष्य को लेकर एक चौराहे पर खड़े हैं। जैसे ही यह जोड़ा अलग होने की कगार पर होता है, कहानी में प्रीत (पूजा हेगड़े) की एंट्री होती है, जो मामले को और उलझा देती है। धवन की फिल्मों के चिर-परिचित अंदाज में, जब दोनों महिलाएं गर्भवती हो जाती हैं, तो फिल्म के दूसरे हाफ में जबरदस्त कॉमेडी और गलतफहमियों का दौर शुरू हो जाता है।

अभिनय और केमिस्ट्री

अपने पिता के साथ चौथी बार काम कर रहे वरुण धवन ने अपनी ऊर्जा और कॉमेडी टाइमिंग से फिल्म को संभाला है। उनके साथ मृणाल ठाकुर और पूजा हेगड़े की केमिस्ट्री कहानी को आगे बढ़ाती है। फिल्म में मनीष पॉल, चंकी पांडे, जिमी शेरगिल और मौनी रॉय जैसे कई कलाकार हैं, लेकिन कहानी मुख्य रूप से इन तीनों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। आलोचकों का मानना है कि फिल्म लगातार हंसाने की कोशिश करती है, हालांकि स्लैपस्टिक कॉमेडी की सफलता दर्शकों की पसंद पर निर्भर करती है।

विजुअल्स और पेसिंग

लंदन की खूबसूरत लोकेशन्स पर फिल्माई गई यह फिल्म अपने प्रोडक्शन डिजाइन और कॉस्ट्यूम्स की वजह से काफी आकर्षक लगती है। लगभग 130 मिनट की अवधि वाली यह फिल्म अपनी गति को बनाए रखती है और कहीं भी उबाऊ नहीं लगती। हालांकि फिल्म का क्लाइमेक्स काफी अनुमानित है, लेकिन 'चुनरी चुनरी' जैसे गानों का तड़का फिल्म की ऊर्जा को बनाए रखता है।

धवन स्टाइल पर अंतिम फैसला

अगर आप यह सोच रहे हैं कि क्या यह फिल्म उम्मीद के मुताबिक अराजकता परोसती है, तो इसका जवाब है 'हाँ'। फिल्म अपनी पहचान को लेकर बिल्कुल स्पष्ट है और यह यथार्थवादी कहानी के बजाय मेलोड्रामा और स्लैपस्टिक कॉमेडी पर ज्यादा जोर देती है। कुछ समीक्षकों ने पुरानी कॉमेडी शैली पर निर्भर रहने के लिए इसकी आलोचना की है, तो वहीं कुछ इसे तनावमुक्त मनोरंजन के रूप में देख रहे हैं। अपने करियर की 46वीं फिल्म में डेविड धवन ने एक बार फिर साबित किया है कि उनका ध्यान दर्शकों के मनोरंजन पर है, जो दशकों से उनकी फिल्मों की पहचान रही है।

द्वारा पॉलिटिकलपीडिया संपादकीय डेस्क
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