जमीनी हकीकत: तेजस Mk1A में देरी ने HAL के सामने खड़ा किया बड़ा संकट
आसमान के सिकंदर तेजस की राह में रोड़ा, अमेरिका के धोखे से भड़का रक्षा मंत्रालय, HAL पर लगेगा भारी जुर्माना!
डिलीवरी की समय सीमा समाप्त हुए दो साल बीत चुके हैं, और भारत का प्रमुख फाइटर जेट कार्यक्रम आपूर्ति के संकट से जूझ रहा है। अब जांच की सुई HAL से हटकर वैश्विक सप्लाई चेन की ओर घूम गई है।
भारत के आसमान में जिस दहाड़ की उम्मीद थी, वह अभी भी खामोश है। 2021 में, सरकार ने 83 Mk1A विमानों के लिए ₹45,696 करोड़ का एक बड़ा सौदा किया था, जो देश की वायु रक्षा रणनीति की आधारशिला है। योजना बहुत महत्वाकांक्षी थी: HAL को फरवरी 2024 में डिलीवरी शुरू करनी थी और हर साल कम से कम आठ जेट भारतीय वायु सेना (IAF) में शामिल करने थे। आज, वह समय-सीमा पूरी तरह बिखर चुकी है। एक भी स्क्वाड्रन-रेडी जेट की डिलीवरी नहीं हुई है, और रक्षा मंत्रालय अब कथित तौर पर सरकारी निर्माता पर भारी जुर्माना लगाने पर विचार कर रहा है।
इंजन का अड़ंगा
इस देरी की जड़ विमान के डिजाइन में कोई खामी नहीं, बल्कि उसका 'दिल' यानी इंजन गायब होना है। तेजस, अमेरिकी दिग्गज जनरल इलेक्ट्रिक (GE) द्वारा निर्मित F404-IN20 इंजन पर निर्भर है। हालांकि विमान सौदे के साथ ही 99 इंजनों के लिए कागजी कार्रवाई पूरी हो गई थी, लेकिन जमीनी हकीकत निराशाजनक है। अप्रैल 2026 तक, भारत को केवल छह इंजन मिले हैं—जो जरूरत के मुकाबले बेहद कम हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के उच्च-स्तरीय हस्तक्षेप के बावजूद, सप्लाई चेन बाधित है, जिससे पूरा कार्यक्रम ठप पड़ गया है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह स्थिति भारत के "आत्मनिर्भर" लक्ष्यों की अनिश्चितता को उजागर करती है, जहां महत्वपूर्ण पुर्जे विदेशी विनिर्माण समय-सीमा से बंधे हुए हैं। हालांकि HAL तेजस स्वदेशी इंजीनियरिंग की एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इंजन के लिए एकल-स्रोत आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता एक प्रणालीगत कमजोरी को दर्शाती है। जब अमेरिका जैसी वैश्विक शक्ति अपने संविदात्मक दायित्वों को पूरा करने में विफल रहती है, तो घरेलू निर्माता—इस मामले में HAL—जवाबदेही के लिए तुरंत निशाने पर आ जाता है, भले ही बाधा हजारों मील दूर हो।
वित्तीय परिणाम
रक्षा मंत्रालय के लिए, यह देरी केवल एक तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक रणनीतिक कमजोरी है। IAF की स्क्वाड्रन संख्या कम होने के साथ, देरी का हर महीना परिचालन तैयारियों को प्रभावित करता है। जुर्माने की लटकती तलवार यह संकेत है कि सरकार का घरेलू विक्रेताओं के प्रति धैर्य खत्म हो रहा है, चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों। यह सख्त अनुबंध प्रवर्तन की ओर एक बदलाव है ताकि भविष्य की परियोजनाएं उसी "दो साल की देरी" के जाल में न फंसें, जिसने इस प्रमुख प्राथमिक अधिग्रहण को रोक दिया है।
बड़ी तस्वीर
भविष्य की ओर देखें तो, यह घटना संभवतः नीतिगत बदलाव को मजबूर करेगी। भारत अब वैश्विक सप्लाई चेन में होने वाली देरी का मूक दर्शक नहीं बना रह सकता। चाहे वह तेजी से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की मांग हो या वैकल्पिक इंजन साझेदारियों की तलाश, सबक साफ है: वास्तविक स्वदेशी वायु शक्ति के लिए केवल एयरफ्रेम जोड़ना काफी नहीं है; इसके लिए प्रोपल्शन चेन (इंजन निर्माण) पर नियंत्रण जरूरी है। जैसे-जैसे हितधारक इन घटनाक्रमों पर नजर रख रहे हैं, निर्माता और भू-राजनीतिक साझेदारों पर भारतीय वायु शक्ति की अगली पीढ़ी के लिए रास्ता साफ करने का दबाव बढ़ रहा है।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।