सीड बैंक से घोटालों तक: हमारे खेतों की नाजुक स्थिति
क्लबघरों में धान के बीज, कृषि में भ्रष्टाचार से लेकर अनुब्रत तक, बेबाक मंत्री दूधकुमार मंडल
जैसे ही पश्चिम बंगाल के नए कृषि मंत्री दूधकुमार मंडल ने कार्यभार संभाला है, यह क्षेत्र प्रणालीगत भ्रष्टाचार और बीज संप्रभुता की सख्त जरूरत के दोहरे संकट का सामना कर रहा है।
नबान्न के गलियारों में एक नए व्यक्ति ने कदम रखा है, जिनके सामने एक कठिन चुनौती है। नवनियुक्त कृषि मंत्री दूधकुमार मंडल खुद को एक चौराहे पर पाते हैं, जहाँ उन्हें एक ऐसा विभाग विरासत में मिला है जो अतीत के कुप्रबंधन के आरोपों और अनुब्रत मंडल जैसे लोगों के प्रभाव के साये में है। एक स्पष्ट आकलन में, मंत्री ने वर्तमान प्रणाली की विडंबना की ओर इशारा किया है, जहाँ धान जैसे महत्वपूर्ण संसाधन अक्सर स्थानीय क्लबघरों में सड़ते रहते हैं, बजाय इसके कि वे उन लोगों के हाथों तक पहुँचें जो मिट्टी में पसीना बहाते हैं।
बीज संकट: दो वास्तविकताओं की कहानी
सीमा पार और हमारे अपने राज्यों में, औसत किसान की संवेदनशीलता स्पष्ट है। रंगामती में, सरकार ने छोटे किसानों को उच्च उपज वाले हाइब्रिड बीज वितरित करने के लिए पुनर्वास कार्यक्रम शुरू किए हैं, ताकि उत्पादन चक्र को बनाए रखा जा सके। फिर भी, बाहरी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर यह निर्भरता दोधारी तलवार है। जब बीज की गुणवत्ता विफल होती है, तो परिणाम विनाशकारी होते हैं। बरगुना में, हाल ही में सौ से अधिक किसानों को आधे करोड़ टका का नुकसान हुआ, जब कथित तौर पर घटिया बीजों के एक बैच के कारण धान के पौधों में समय से पहले ही बांझ बालियां निकल आईं। स्थानीय डीलरों द्वारा विशिष्ट ब्रांडों का उपयोग करने के लिए मजबूर किए जाने के बाद, किसानों के पास कोई चारा नहीं बचा था और उन्हें मुआवजे के नाम पर ऐसी मामूली राशि दी गई जो उनकी लागत का एक छोटा सा हिस्सा भी बमुश्किल कवर कर पाई।
इसकी तुलना तानोर, राजशाही जैसी जगहों पर हो रही जमीनी क्रांति से करें। आठ साल पहले, यूसुफ मोल्ला नामक एक किसान ने एक छोटे से कमरे में "सीड बैंक" की स्थापना की, जिसमें 261 स्वदेशी चावल की किस्मों को संरक्षित किया गया। यह पहल, जिसे अब एक स्थानीय समिति द्वारा प्रबंधित किया जाता है, बहुराष्ट्रीय बीज निगमों के एकाधिकार के खिलाफ एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करती है। बीजों के आदान-प्रदान के माध्यम से—जहाँ एक किलो लेने पर अगले साल पांच किलो वापस करना होता है—ये किसान प्रभावी रूप से अपनी कृषि स्वतंत्रता को पुनः प्राप्त कर रहे हैं, यह साबित करते हुए कि स्थानीय जैव विविधता ही बाजार की अस्थिरता के खिलाफ एकमात्र वास्तविक बीमा है।
बड़ी तस्वीर
कोलकाता में मंत्री स्तरीय नीति और ग्रामीण जिलों की जमीनी हकीकत के बीच का अंतर दूधकुमार मंडल के लिए प्राथमिक चुनौती है। वितरण को सुव्यवस्थित करने पर मंत्री का ध्यान समयोचित है, लेकिन उन्हें उस "गेटकीपर" संस्कृति को संबोधित करना होगा जिसने क्षेत्रीय राजनीति को जकड़ रखा है। चाहे वह सुमित रॉय जैसे सहयोगियों द्वारा डाला गया प्रभाव हो—जिन्हें अक्सर प्रशासनिक हस्तक्षेप के संबंध में उद्धृत किया जाता है—या अनुब्रत जैसे लोगों की व्यापक छाया, विभाग की विश्वसनीयता इस बात पर टिकी है कि वह कृषि सहायता को राजनीतिक संरक्षण से अलग करने में कितनी सक्षम है।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है, यह सरल है: भारत की कृषि अर्थव्यवस्था राष्ट्र की रीढ़ बनी हुई है, फिर भी यह वर्तमान में संदिग्ध बीज वितरकों और अपारदर्शी सरकारी योजनाओं की निर्भरता के चक्र में फंसी हुई है। यदि कृषक बंधु प्रकल्प या इसी तरह की अन्य पहल सफल होनी हैं, तो ध्यान राजनीतिक दिखावे से हटकर संसाधनों के पारदर्शी, जमीनी वितरण पर होना चाहिए। बीज आपूर्तिकर्ताओं की कड़ी निगरानी और स्थानीय बीज-बचत समूहों को सशक्त बनाए बिना, किसान हर प्रशासनिक विफलता का खामियाजा भुगतता रहेगा। दूधकुमार मंडल के लिए, कार्य सुर्खियों से आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करना है कि क्लबघरों में धूल फांक रहे बीज आखिरकार उन खेतों तक पहुँचें जिनके लिए वे बने थे।
विश्लेषण: पारदर्शिता बनाम संरक्षण
पैटर्न स्पष्ट है: जहाँ राज्य का बुनियादी ढांचा विफल होता है, वहाँ किसान या तो शिकारी कॉर्पोरेट आपूर्ति श्रृंखलाओं की दया पर छोड़ दिए जाते हैं या स्थानीय राजनीतिक बिचौलियों पर निर्भर होने के लिए मजबूर होते हैं। "सीड बैंक" मॉडल लचीलेपन के लिए एक खाका पेश करता है, लेकिन इसके लिए राज्य के ऐसे समर्थन की आवश्यकता है जो शक्तिशाली पार्टी पदाधिकारियों के प्रभाव से मुक्त हो। खेती के भविष्य को वास्तव में सुरक्षित करने के लिए, सरकार को बीज वितरण के विकेंद्रीकरण को प्राथमिकता देनी चाहिए और निजी वितरकों को गुणवत्ता के लिए जवाबदेह बनाना चाहिए। मंडल प्रशासन में वर्तमान तनाव इन मुद्दों की पहचान का संकेत देता है, लेकिन बयानबाजी से सुधार की ओर बढ़ना ही सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।