रसोई से कलेक्ट्रेट तक: गुजरात कैसे बना रहा है 'लखपति दीदियां'
ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गुजरात ने 5.96 लाख 'लखपति दीदियों' की पहचान की

सरकार के ताजा आंकड़ों से पुष्टि हुई है कि ग्रामीण गुजरात की लगभग 6 लाख महिलाओं ने 1 लाख रुपये की वार्षिक आय की सीमा को पार कर लिया है, जो राज्य की जमीनी अर्थव्यवस्था में एक बड़े बदलाव का संकेत है।
नवसारी कलेक्ट्रेट में कैंटीन सिर्फ चाय पीने की जगह नहीं है; यह भावनाबेन पटेल की आर्थिक स्वतंत्रता का केंद्र है। एक दशक पहले, भावनाबेन 'गायत्री सखी मंडल' की एक साधारण सदस्य थीं। आज, वह कैटरिंग कॉन्ट्रैक्ट्स, कैंटीन संचालन और खेती को संभालते हुए एक सफल व्यवसायी हैं और सालाना 10 लाख रुपये से अधिक कमा रही हैं। वह उन 5.96 लाख महिलाओं में से एक हैं, जिन्हें गुजरात सरकार ने आधिकारिक तौर पर 'लखपति दीदी' के रूप में मान्यता दी है—यह दर्जा केवल बैंक बैलेंस ही नहीं, बल्कि घरेलू अर्थव्यवस्था में आए बुनियादी बदलाव को भी दर्शाता है।
सशक्तिकरण की कार्यप्रणाली
मंगलवार को जारी किए गए आंकड़े एक बड़े, राज्य-समर्थित पैमाने पर हो रहे बदलाव की तस्वीर पेश करते हैं। केंद्र के ग्रामीण आजीविका कार्यक्रम के तहत, गुजरात ने लगभग 10 लाख संभावित लाभार्थियों का लक्ष्य रखा है। यह रणनीति केवल सब्सिडी पर निर्भर नहीं है। 'गुजरात लाइवलीहुड प्रमोशन कंपनी' ने 124 मास्टर ट्रेनर्स की एक टीम तैनात की है, जिन्होंने 10,000 से अधिक सामुदायिक संसाधन व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया है। कृषि सखी, पशु सखी और बैंक सखी के रूप में नामित ये लोग अंतिम छोर तक संपर्क का काम करते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों की महिलाएं भी क्रेडिट और बाजार तक पहुंच बना सकें।
खेड़ा जिले की शिल्पाबेन पांड्या जैसी महिलाओं के लिए, यह समर्थन जीवन-यापन और उद्यम के बीच का अंतर साबित हुआ। 2010 से 'शिल्पा सखी मंडल' की सदस्य रहीं शिल्पाबेन ने 'रूरल सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स' (R-SETI) से प्रशिक्षण लेकर पारंपरिक भूमिकाओं से हटकर फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में कदम रखा। आज, वह प्राकृतिक शर्बत बनाने का व्यवसाय चलाती हैं और सालाना लगभग 10 लाख रुपये कमाती हैं। उनकी सफलता की कहानी वह मॉडल है जिसे सरकार पूरे राज्य में दोहराना चाहती है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह पहल भारतीय विकास नीति में एक व्यापक बदलाव को दर्शाती है: केवल कल्याणकारी योजनाओं पर निर्भर रहने के बजाय 'महिला-नेतृत्व वाले विकास' की ओर बढ़ना। उद्यमिता को बढ़ावा देकर, राज्य ग्रामीण परिवारों को आर्थिक झटकों से सुरक्षित करने का प्रयास कर रहा है। जब स्वयं सहायता समूह की कोई महिला एक निष्क्रिय लाभार्थी से उत्पादक बन जाती है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव शिक्षा, पोषण और स्थानीय बाजार पर पड़ता है। हालांकि, असली चुनौती स्थिरता की होगी। जैसे-जैसे ये हजारों महिलाएं अपने व्यवसायों का विस्तार करेंगी, बाजार तक निरंतर पहुंच और कोल्ड-चेन इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता बढ़ेगी। क्या ये लखपति दीदियां साल-दर-साल इस ब्रैकेट में बनी रह पाएंगी, यह राज्य की दीर्घकालिक बिजनेस मेंटरशिप प्रदान करने की क्षमता पर निर्भर करेगा।
व्यापक परिदृश्य
डेटा पुष्टि करता है कि यह कार्यक्रम गति पकड़ रहा है। SHG से जुड़ी महिलाएं कृषि, कैटरिंग से लेकर वैल्यू-एडेड फूड प्रोसेसिंग तक के विविध क्षेत्रों में सफलता पा रही हैं। इन आय को औपचारिक रूप देकर, सरकार अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से को मुख्यधारा में ला रही है। यदि पहचान की वर्तमान गति जारी रहती है, तो राज्य के ग्रामीण SHG सदस्यों का एक बड़ा हिस्सा लाख रुपये की वार्षिक आय की सीमा को पार कर सकता है, जो हजारों ग्रामीण परिवारों के लिए वित्तीय आधार को फिर से परिभाषित कर सकता है।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।