खेतों से फर्स्ट क्लास तक: जेवर के किसानों ने भरी उड़ान
नोएडा एयरपोर्ट को जमीन देने वाले किसानों ने मांगी नौकरी, सीएम योगी आदित्यनाथ बोले- जेवर में आना चाह रहे कुबेर
नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के वादे के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन देने वाले 172 किसानों के लिए, लखनऊ की यह ऐतिहासिक पहली उड़ान मिट्टी से आसमान तक के एक खट्टे-मीठे सफर की तरह रही।
डिपार्चर लाउंज का नजारा जेवर के धूल भरे खेतों से बिल्कुल अलग था। सोमवार को 172 किसान—जिनमें से कई लोगों ने कभी हवाई जहाज में कदम नहीं रखा था—लखनऊ के लिए एक कमर्शियल फ्लाइट में सवार हुए। पारंपरिक परिधानों में सजे और हाथों में बोर्डिंग पास थामे, घबराहट और गर्व के मिले-जुले अहसास के साथ ये परिवार सिर्फ यात्री नहीं थे; वे उस क्षेत्र के मुख्य हितधारक थे, जिसे इस इलाके के लिए एक ऐतिहासिक बदलाव माना जा रहा है। जैसा कि यह मूल लेख बताता है, यह उड़ान केवल एक यात्रा नहीं थी; यह उन लोगों के लिए एक प्रतीकात्मक जीत थी जिन्होंने नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए अपनी जमीन दी है।
बदलता परिदृश्य
लखनऊ में बातचीत के दौरान, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रतिनिधिमंडल को संबोधित करते हुए जेवर के बदलाव को स्पष्ट शब्दों में रखा। उन्होंने उस समय को याद किया जब यह क्षेत्र अराजकता और सुरक्षा चिंताओं, विशेषकर महिलाओं के लिए, का पर्याय था, जहां सूर्यास्त के बाद आवाजाही रुक जाती थी। आज, कहानी बड़े विकास की ओर मुड़ गई है। मुख्यमंत्री ने क्षेत्र के नए आकर्षण का वर्णन करते हुए कहा कि जो इलाका कभी दिल्ली के पास एक शांत गांव हुआ करता था, वह अब एक ऐसा गंतव्य बन गया है जिसे देखने के लिए खुद 'कुबेर'—धन के पौराणिक कोषाध्यक्ष—भी आना चाह रहे हैं।
अधूरे वादे
हालांकि, विमानन क्षेत्र की उपलब्धियों और आर्थिक संभावनाओं के जश्न के बीच, एक व्यावहारिक तनाव भी बना हुआ है। जबकि कई किसानों ने अपनी जमीन को एक वैश्विक केंद्र बनते देखकर गर्व महसूस किया, लेकिन रोजगार का वादा अब भी विवाद का विषय बना हुआ है। 65 वर्षीय एक किसान, जिन्होंने 30 बीघा जमीन दी थी, ने कहा कि विकास दिख रहा है और स्वागत योग्य है, लेकिन अधिग्रहण प्रक्रिया के दौरान किए गए औपचारिक रोजगार के वादे अभी भी अधूरे हैं। यह बड़े पैमाने की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में एक आम समस्या है: राष्ट्रीय योगदान का गर्व और आजीविका सुरक्षा की तत्काल आवश्यकता के बीच का संघर्ष।
यह क्यों मायने रखता है
यह घटना भारत के बुनियादी ढांचे के उछाल में एक महत्वपूर्ण पैटर्न को उजागर करती है: "हितधारक अंतर" (stakeholder gap)। जब नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जैसी विशाल परियोजनाओं को तेजी से पूरा किया जाता है, तो भौतिक परिदृश्य परियोजना से प्रभावित लोगों के लिए लिखे गए सामाजिक अनुबंधों की तुलना में तेजी से बदलता है। सरकार के लिए, किसानों को हवाई जहाज से राजधानी ले जाना समावेशी विकास की एक शक्तिशाली कहानी पेश करता है। हालांकि, ऐसी परियोजनाओं की दीर्घकालिक सफलता अक्सर भव्य बुनियादी ढांचे के विजन और स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन की जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को पाटने पर निर्भर करती है। यदि इन किसानों को वास्तव में अपनी जमीन के साथ "आसमान छूना" है, तो इस बदलाव को प्रतीकात्मक इशारों से आगे बढ़कर स्थायी आर्थिक एकीकरण की ओर ले जाना होगा।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।