असेंबली लाइन्स से सिलिकॉन सपनों तक: भारत बना दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल निर्माता
चिप-दर-चिप: भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फोन निर्माता; पीएम मोदी ने 'मेक इन इंडिया' इलेक्ट्रॉनिक्स का खाका खींचा
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को स्थानीय बनाने के एक दशक लंबे प्रयास ने भारत को आयात करने वाले देश से बदलकर एक वैश्विक निर्यात पावरहाउस बना दिया है, जिसका नया फोकस सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम पर है।
हाल ही में उद्घाटन की गई सीजी सेमी (CG Semi) आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (OSAT) सुविधा का दृश्य केवल एक रिबन-कटिंग समारोह से कहीं अधिक था; यह 2014 में शुरू हुए उस बदलाव का भौतिक प्रमाण था। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जापान भेजे जाने वाले भारत में बने चिप्स का पहला बैच सौंपा गया, तो देश की औद्योगिक यात्रा का नैरेटिव केवल मोबाइल फोन असेंबली से आगे बढ़कर सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग की जटिल और महत्वपूर्ण दुनिया की ओर मुड़ गया।
आंकड़े एक दशक पहले के परिदृश्य से बिल्कुल उलट तस्वीर पेश करते हैं। 2014 में, देश में बिकने वाले केवल 26% मोबाइल फोन स्थानीय रूप से निर्मित थे और भारत अपनी डिजिटल जरूरतों के लिए विदेशी फैक्ट्रियों पर भारी निर्भर था। आज, यह आंकड़ा 99.2% तक पहुंच गया है। उत्पादन का मूल्य छह गुना बढ़ गया है, जो 2014-15 में 1.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 के वित्तीय वर्ष में 11.3 लाख करोड़ रुपये के प्रभावशाली स्तर पर पहुंच गया है।
नीति, पीएलआई (PLI) और वैश्विक बदलाव
यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं था। यह एक सोची-समझी, नीति-संचालित रणनीति का परिणाम था, जिसमें प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजनाएं सबसे महत्वपूर्ण रहीं। वैश्विक निर्माताओं को अपनी सप्लाई चेन को भारतीय धरती पर स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहित करके, सरकार ने देश को उन कंपनियों के लिए एक व्यवहार्य विकल्प बना दिया जो भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि पिछले एक दशक में मोबाइल फोन निर्यात में 127 गुना की भारी वृद्धि हुई है, और अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष के अंत तक यह शिपमेंट 35 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
अब 300 से अधिक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स के चालू होने के साथ—जो 2014 में केवल दो थीं—यह इकोसिस्टम तेजी से परिपक्व हुआ है। अब फोकस केवल हैंडसेट को असेंबल करने से आगे बढ़ गया है; अब लक्ष्य वैल्यू चेन पर अपना नियंत्रण स्थापित करना है। चिप पैकेजिंग और टेस्टिंग को एकीकृत करके, भारत वैश्विक तकनीकी संप्रभुता की दौड़ में अपनी जगह पक्की करने का प्रयास कर रहा है।
यह क्यों मायने रखता है: बड़ी तस्वीर
यह विकास वैश्विक सप्लाई चेन की अस्थिरता के खिलाफ एक रणनीतिक सुरक्षा कवच का प्रतिनिधित्व करता है। एक "एंड-टू-एंड" इलेक्ट्रॉनिक्स वैल्यू चेन बनाकर, भारत उस तरह की आयात निर्भरता के प्रति अपनी भेद्यता को कम कर रहा है जिसने अतीत में उसकी औद्योगिक क्षमता को बाधित किया था। सेमीकंडक्टर क्षेत्र में कदम रखना अगला तार्किक, हालांकि कठिन, कदम है। जहां असेंबली से तत्काल रोजगार के अवसर मिलते हैं—लार्ज स्केल इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग योजना के तहत लगभग 1.7 लाख अतिरिक्त नौकरियां—वहीं चिप्स को पैकेज करने और अंततः फैब्रिकेट करने की क्षमता "विकसित भारत" के लिए आवश्यक दीर्घकालिक तकनीकी गहराई प्रदान करती है।
आगे की चुनौती इस गति को बनाए रखने में है। जैसे-जैसे दुनिया अपनी तकनीकी निर्भरता को फिर से व्यवस्थित कर रही है, भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपनी नीतिगत महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप अपने बुनियादी ढांचे और प्रतिभा पूल को कितनी तेजी से विकसित कर पाता है। यह "चिप-दर-चिप" दृष्टिकोण अतीत की त्वरित-समाधान वाली औद्योगिक नीतियों से अलग है, जो देश के इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए एक अधिक धैर्यवान और बुनियादी ढांचे पर केंद्रित रोडमैप का संकेत देता है।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।