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दिल्ली की नई EV पॉलिसी: क्या सब्सिडी के पुराने वादों का बोझ नई योजनाओं की रफ्तार रोकेगा?

दिल्ली में नई EV पॉलिसी पर कैसे भरोसा करें लोग? 3 साल से अटकी है पुरानी सब्सिडी

द्वारा रोहन गुप्ताप्रकाशित 4 जुलाई 2026· 2 मिनट पढ़ें
दिल्ली की नई EV पॉलिसी: क्या सब्सिडी के पुराने वादों का बोझ नई योजनाओं की रफ्तार रोकेगा?
दिल्ली की नई EV पॉलिसी: क्या सब्सिडी के पुराने वादों का बोझ नई योजनाओं की रफ्तार रोकेगा?

दिल्ली सरकार ने 2030 तक इलेक्ट्रिक वाहनों के बड़े लक्ष्य तय किए हैं, लेकिन पुरानी सब्सिडी का इंतज़ार कर रहे हजारों खरीदार नई पॉलिसी पर सवाल उठा रहे हैं।

दिल्ली सरकार की नई इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) पॉलिसी, जो 1 जुलाई 2026 से प्रभावी हुई है, शहर को 2030 तक पूरी तरह से इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर ले जाने का महत्वाकांक्षी खाका खींचती है। इस पॉलिसी के तहत टू-व्हीलर पर 30,000 रुपये, थ्री-व्हीलर पर 50,000 रुपये और चार-पहिया वाहनों पर 1 लाख रुपये तक की सब्सिडी का प्रावधान है। सरकार का यह कदम पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराता है, लेकिन इस चमकती पॉलिसी की सतह के नीचे पुरानी फाइलों का एक ऐसा ढेर है जो सरकार की विश्वसनीयता पर भारी पड़ रहा है।

जब वादों की रफ्तार धीमी पड़ जाए

तथ्य यह है कि नई पॉलिसी के लुभावने आंकड़ों के बीच, पुरानी नीति के तहत करीब 4,000 लोग आज भी अपनी सब्सिडी का इंतज़ार कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, यह लंबित राशि लगभग 7.5 करोड़ रुपये तक पहुँचती है। कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ खरीदारों ने मई 2023 में ही वाहन खरीद लिए थे, सभी दस्तावेज पूरे किए और डीलर के आश्वासन पर भरोसा किया, लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी उनके खातों में प्रोत्साहन राशि नहीं पहुँची है।

भरोसे का संकट

यह स्थिति केवल 15,000 से 20,000 रुपये के आर्थिक नुकसान का मसला नहीं है, बल्कि उस 'ग्रीन ट्रांजिशन' के विश्वास का है जो उपभोक्ता को पेट्रोल पंप से हटाकर चार्जिंग स्टेशन तक ले आता है। जब कोई नागरिक सरकार की अपील पर पर्यावरण संरक्षण के लिए ईवी चुनता है, तो वह सरकारी प्रोत्साहन को एक 'गारंटी' मानता है। जब यही गारंटी सालों की कागजी दौड़ में बदल जाती है, तो नई पॉलिसी के प्रति बाजार का उत्साह स्वाभाविक रूप से ठंडा पड़ने लगता है।

क्यों यह मायने रखता है: बड़ा नजरिया

आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो ईवी सेगमेंट में मांग बनाए रखने के लिए केवल नीतियां बनाना काफी नहीं है; 'एग्जीक्यूशन' (कार्यान्वयन) ही वह कड़ी है जो उपभोक्ता के भरोसे को कायम रखती है। हालांकि अलग-अलग माध्यमों जैसे eenadu या andhrajyothy पर अन्य क्षेत्रीय खबरें सुर्खियां बटोरती रहती हैं, लेकिन दिल्ली का यह ईवी संकट नीतिगत विफलता का एक स्पष्ट उदाहरण है। बिना पुरानी देनदारियों का निपटारा किए, नई सब्सिडी की घोषणा करना बाजार में एक अस्थिर संदेश भेजता है। भविष्य में सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि पॉलिसी के primary उद्देश्यों और legal उत्तरदायित्वों में संतुलन बना रहे, ताकि ईवी अपनाने वाले पहले ग्राहक खुद को ठगा हुआ महसूस न करें।

पारदर्शिता का अभाव

परिवहन विभाग और डीलर्स के बीच फंसी यह सब्सिडी प्रक्रिया अक्सर लालफीताशाही की भेंट चढ़ जाती है। खरीदार बार-बार चक्कर काटते हैं, दस्तावेजों की पुष्टि करते हैं, लेकिन सिस्टम उन्हें सिर्फ अगले कुछ महीनों का आश्वासन देता है। अगर दिल्ली को सच में 2030 तक एक ईवी हब बनाना है, तो सरकार को न केवल नई दरों का ऐलान करना होगा, बल्कि पुरानी गलतियों को सुधारने के लिए एक 'टाइम-बाउंड' रिड्रेसल सिस्टम भी बनाना होगा।

द्वारा रोहन गुप्ता
बिज़नेस संवाददाता

रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।