भारत के खिलाफ यूरोपीय हथियारों का इस्तेमाल: वैश्विक रक्षा आपूर्ति पर जयशंकर की तीखी टिप्पणी
भारत के खिलाफ इस्तेमाल किए जा रहे यूरोपीय हथियार: विदेश मंत्री जयशंकर ने जताई चिंता
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत के खिलाफ यूरोपीय देशों में निर्मित हथियारों के इस्तेमाल को लेकर गंभीर चिंता जताई है, जो अंतरराष्ट्रीय रक्षा जवाबदेही में एक बड़ी खामी को उजागर करता है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर की हालिया टिप्पणियों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के एक विवादास्पद मुद्दे को सामने ला दिया है। रक्षा निर्यात के रणनीतिक प्रभावों पर बात करते हुए, मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि यूरोपीय देशों द्वारा निर्मित हथियारों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया जा रहा है। प्राथमिक स्रोतों और हालिया सुरक्षा आकलन पर आधारित यह अवलोकन, वैश्विक हथियारों के प्रसार की जटिलताओं और रक्षा व्यापार नीतियों के अनपेक्षित परिणामों को रेखांकित करता है, जिनमें अक्सर 'एंड-यूज़र' (अंतिम उपयोगकर्ता) की कड़ी निगरानी का अभाव होता है।
रणनीतिक असंतुलन
वर्षों से, भारत ने अपनी रक्षा खरीद में एक नाजुक संतुलन बनाए रखा है, जिसमें पश्चिम और पूर्व दोनों से तकनीक ली गई है। हालांकि, मंत्री का बयान एक ऐसे पैटर्न की ओर इशारा करता है जहां क्षेत्रीय स्थिरता के नाम पर निर्यात किए गए हथियार अंततः ऐसे संघर्षों में इस्तेमाल होते हैं, जो सीधे तौर पर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करते हैं। चिंता केवल हार्डवेयर को लेकर नहीं है, बल्कि उन देशों द्वारा निगरानी की कमी को लेकर है जो अक्सर खरीदार के पड़ोस की दीर्घकालिक भू-राजनीतिक वास्तविकता के बजाय अपने व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता देते हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह केवल एक कूटनीतिक शिकायत से कहीं अधिक है; यह रक्षा पारदर्शिता में बढ़ती दरार का संकेत है। जब कोई देश अपने रणनीतिक साझेदारों या तटस्थ आपूर्तिकर्ताओं को अपनी तकनीक का इस्तेमाल एक लोकतांत्रिक साझेदार के खिलाफ करने देता है, तो यह स्वदेशी रक्षा विनिर्माण पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर करता है। यहाँ 'मेक इन इंडिया' की पहल और अधिक जरूरी हो जाती है। यदि भारत वैश्विक शक्तियों के नैतिक निर्यात नियंत्रण पर भरोसा नहीं कर सकता, तो एक मजबूत और आत्मनिर्भर रक्षा औद्योगिक आधार बनाना ही संप्रभुता का एकमात्र स्थायी रास्ता है।
वैश्विक प्रणाली को समझना
वर्तमान वैश्विक रक्षा प्रणाली अक्सर अपारदर्शी होती है, जिसकी आपूर्ति श्रृंखलाएं तेजी से बदलती रहती हैं। चाहे द्वितीयक बाजार हों या प्रत्यक्ष हस्तांतरण, घातक उपकरणों की आवाजाही पर नजर रखना मुश्किल बना रहता है। जैसे-जैसे भारत अपने तकनीकी क्षेत्रों को एकीकृत कर रहा है और अपने डिजिटल बुनियादी ढांचे का विस्तार कर रहा है, एक अधिक सुरक्षित और स्वदेशी प्रणाली की आवश्यकता स्पष्ट हो गई है। मंत्री की यह आलोचना वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं के लिए एक चेतावनी है: भारत नजर रख रहा है, और जो लोग हथियारों के व्यापार से मुनाफा कमाते हैं, उनसे जवाबदेही मांगने के लिए भारत अपनी कूटनीतिक ताकत का इस्तेमाल करेगा।
इसके व्यापक निहितार्थ यह बताते हैं कि भारत आगामी बहुपक्षीय मंचों पर हथियारों के निर्यात के संबंध में सख्त अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के लिए दबाव डालेगा। सरकार के लिए, यह उन उपकरणों से सीमाओं को सुरक्षित करने का मामला है, जिन्हें कभी भी उसके विरोधियों के हाथों में नहीं होना चाहिए था। जैसे-जैसे स्थिति विकसित होगी, नई दिल्ली यूरोपीय राजधानियों से अधिक पारदर्शिता की मांग करेगी, और एक बड़े खरीदार के रूप में अपनी स्थिति का लाभ उठाकर वैश्विक रक्षा मानकों में बदलाव लाने का प्रयास करेगी।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।