सूखे नल और टूटे वादे: गोरखपुर में 'जल जीवन मिशन' की जमीनी हकीकत
जंगल कौड़िया में जल जीवन मिशन योजना में लापरवाही: 3 साल से टंकी बनी, 2 साल से नल सूखे; घरों तक नहीं पहुंचा पानी
जहां सरकारी आंकड़े दावा करते हैं कि लाखों ग्रामीण परिवारों तक साफ पानी पहुंच रहा है, वहीं गोरखपुर के जंगल कौड़िया ब्लॉक की हकीकत बिल्कुल उलट है, जहां बुनियादी ढांचा बेकार पड़ा है।
मुहम्मदपुर पचवारा खास गांव में पानी की टंकी तीन साल से एक मूक स्मारक बनी हुई है। ग्रामीणों के लिए यह विशाल ढांचा एक अधूरे वादे की कड़वी याद है। केंद्र की महत्वाकांक्षी 'जल जीवन मिशन' योजना—जो ग्रामीण जीवन को निरंतर जल आपूर्ति के जरिए बदलने के लिए एक प्रोजेक्ट है—के बावजूद, गोरखपुर के इस गांव में सैकड़ों घरों तक पानी की एक बूंद भी नहीं पहुंची है। अमरनाथ गुप्ता और रामबेलास जायसवाल जैसे परिवारों के घरों में दो साल पहले नल लगाए गए थे, लेकिन पाइपों से पानी के बजाय सिर्फ हवा की आवाज आती है।
सरकारी रिपोर्टों में बड़ा अंतर
जमीनी स्तर पर व्याप्त नाराजगी उत्तर प्रदेश के व्यापक सरकारी दावों के बिल्कुल विपरीत है। आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों और सरकारी स्रोत के आंकड़ों के अनुसार, जल जीवन मिशन ने देश भर में 80% से अधिक कवरेज के साथ बड़ी प्रगति की है। हालांकि, क्षेत्र से आ रही ब्रेकिंग खबरों के मुताबिक, "भौतिक पूर्णता" और "कार्यात्मक उपयोगिता" के बीच का अंतर अब नजरअंदाज करना असंभव हो गया है। जल निगम का कहना है कि ओवरहेड टैंक का निर्माण तकनीकी रूप से पूरा हो चुका है, लेकिन सच्चाई यह है कि इन पूरी हो चुकी परियोजनाओं में से आधे से भी कम वास्तव में घरों तक पानी पहुंचा पा रही हैं।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
यह बड़े पैमाने पर सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में आने वाली "अंतिम मील" (लास्ट-माइल) की विफलता का एक क्लासिक उदाहरण है। टंकी बनाना केवल पहला कदम है; इस मिशन की असली सफलता पाइप नेटवर्क की अखंडता और आपूर्ति श्रृंखला की विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। जब ठेकेदार, कई परियोजनाओं के बोझ तले दबे होने के कारण काम अधूरा छोड़ देते हैं, तो पूरा निवेश डूबने का खतरा पैदा हो जाता है। प्रणालीगत मुद्दा केवल पानी की कमी का नहीं है; यह जवाबदेही का है। राज्य भर में 26 इंजीनियरों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की खबरें बताती हैं कि प्रशासन आखिरकार प्रशासनिक खामियों को स्वीकार कर रहा है, फिर भी मुहम्मदपुर के निवासी इस सुस्ती की कीमत चुका रहे हैं।
आगे की राह
जल निगम के अधिशासी अभियंता, अखिल आनंद ने आपूर्ति में कमी के लिए लाइनों में संभावित रुकावटों का हवाला देते हुए दो महीने के भीतर सुधार का वादा किया है। हालांकि, उन ग्रामीणों के लिए जो वर्षों से ठेकेदारों से बहाने सुन रहे हैं, ये आश्वासन एक थका देने वाली पुनरावृत्ति जैसे लगते हैं। क्या यह एक अस्थायी समस्या है या गहरी संरचनात्मक लापरवाही का लक्षण, यह मुख्य सवाल बना हुआ है। जब तक उन लोगों के घरों में पानी नहीं पहुंचता जिन्हें वादा किया गया था, तब तक आधिकारिक आंकड़े प्यासे गांव के लिए महज एक सांत्वना बने रहेंगे।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।