800 सीटों वाली संसद का गणित: नए परिसीमन फॉर्मूले के पीछे की पूरी कहानी
EAC-PM ने परिसीमन के लिए सीटों के 'टारगेटेड' बंटवारे का सुझाव दिया है, जिससे सभी बड़े राज्यों की सीटों में 50% तक की वृद्धि संभव है।

जैसे-जैसे केंद्र सरकार भारत के चुनावी नक्शे को फिर से तैयार करने की तैयारी कर रही है, EAC-PM का एक नया वर्किंग पेपर लोकसभा के विस्तार का खाका पेश करता है, जिसमें क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बनाए रखने की कोशिश की गई है।
दिल्ली के सत्ता के गलियारों में एक ही बड़ा सवाल गूंज रहा है: भारत के लोकतंत्र के नक्शे को संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचाए बिना कैसे फिर से तैयार किया जाए? 1971 की जनगणना के बाद से जमे हुए परिसीमन पर अब पहली बार काम शुरू होने वाला है, ऐसे में सरकार लोकसभा सीटों की कुल संख्या को 800 से अधिक करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) का एक हालिया वर्किंग पेपर इसके लिए तकनीकी आधार प्रदान करता है। इसमें निर्वाचन क्षेत्रों के 'टारगेटेड' बंटवारे का सुझाव दिया गया है, जिससे सदन की संख्या बढ़कर 824 हो जाएगी। सैद्धांतिक रूप से, यह मॉडल हर राज्य को आनुपातिक प्रतिनिधित्व में नुकसान से बचाने का दावा करता है।
50% विस्तार मॉडल
शमिका रवि और मुदित कपूर द्वारा तैयार किया गया यह प्रस्तावित मॉडल केवल जनसंख्या के आंकड़ों से आगे की बात करता है। एक समान वृद्धि की सिफारिश करते हुए, यह फॉर्मूला बताता है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों की सीटें 80 से बढ़कर 120 हो सकती हैं, जबकि तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों की सीटें 39 से बढ़कर 59 हो सकती हैं। लद्दाख और सिक्किम सहित छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व प्रभावी रूप से दोगुना हो जाएगा। मौजूदा 543 सीटों में से, यह मॉडल 170 निर्वाचन क्षेत्रों को विभाजित करने का प्रस्ताव देता है—कुछ को दो में, तो कुछ को तीन में—ताकि किसी भी राज्य की मौजूदा हिस्सेदारी को कम किए बिना 50% का यह विस्तार किया जा सके।
संघीय खींचतान
सरकार के इस दावे के बावजूद कि किसी भी राज्य को नुकसान नहीं होगा, राजनीतिक माहौल गर्म है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में विपक्षी नेताओं ने इस पर तीखी असहमति जताई है। उन्होंने इसे 'ऐतिहासिक अन्याय' करार दिया है और आशंका जताई है कि इससे दक्षिण भारत के लोग राष्ट्रीय विधायी प्रक्रिया में 'दूसरे दर्जे के नागरिक' बनकर रह जाएंगे। हालांकि केंद्र सरकार का दावा है कि 50% फॉर्मूले के तहत दक्षिणी राज्यों की कुल हिस्सेदारी (जो वर्तमान में लगभग 23.7% है) लगभग अपरिवर्तित रहेगी, लेकिन विपक्ष में इसे लेकर गहरा अविश्वास है। INDIA गठबंधन ने परिसीमन विधेयक का विरोध करने का संकल्प लिया है, जिससे एक हंगामेदार संसदीय सत्र के आसार बन गए हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: बड़ी तस्वीर
मूल तनाव जनसांख्यिकीय वास्तविकता और संघीय समानता के बीच का संघर्ष है। 1970 के दशक से, सीटों के आवंटन पर लगी रोक का उद्देश्य उन राज्यों को पुरस्कृत करना था जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया। अब, जब देश संसदीय प्रतिनिधित्व को 2011 की जनगणना के अनुरूप करने की ओर बढ़ रहा है, तो चुनौती यह है कि आधुनिक जनसंख्या बदलावों—विशेष रूप से शहरी विकास केंद्रों के विस्तार—को कैसे दर्शाया जाए, बिना उन राज्यों को दंडित किए जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से अपनी जनसंख्या को नियंत्रित रखा है। यदि इसे लागू किया जाता है, तो 824 सीटों वाला यह मॉडल केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं होगा; यह भारतीय राज्य की बुनियादी पुनर्रचना होगी, जो उत्तर के राजनीतिक वजन और दक्षिण की विकासात्मक सफलता की कहानियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करेगी। क्या यह 'आनुपातिक विस्तार' चुनावी राजनीति की तपिश को झेल पाएगा, यह वर्तमान विधायी एजेंडे की सबसे बड़ी परीक्षा है।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।