क्रिकेटर अभिषेक शर्मा ने 'पर्सनैलिटी राइट्स' की सुरक्षा के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया
क्रिकेटर अभिषेक शर्मा ने 'पर्सनैलिटी राइट्स' की सुरक्षा के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया
भारतीय क्रिकेट के उभरते सितारे ने अपनी सार्वजनिक छवि को निशाना बनाने वाली डिजिटल गलत सूचनाओं और छेड़छाड़ की गई सामग्री के खिलाफ कानूनी हस्तक्षेप की मांग की है।
आधुनिक एथलीटों के लिए डिजिटल कोर्टरूम अब क्रिकेट पिच की तरह ही भीड़भाड़ वाला होता जा रहा है। क्रिकेटर अभिषेक शर्मा दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले नवीनतम सार्वजनिक व्यक्तित्व बन गए हैं। उन्होंने मानहानिकारक और डिजिटल रूप से बदली गई सामग्री के प्रसार के खिलाफ अपने 'पर्सनैलिटी राइट्स' (व्यक्तित्व अधिकारों) की औपचारिक सुरक्षा की मांग की है। यह मुकदमा, जिसका उद्देश्य उनकी छवि के अनधिकृत उपयोग पर रोक लगाना है, व्यक्तिगत गोपनीयता और सोशल मीडिया की वायरल प्रकृति के बीच बढ़ते तनाव को रेखांकित करता है।
प्रारंभिक सुनवाई के दौरान, जस्टिस ज्योति सिंह ने तत्काल राहत देने में संकोच व्यक्त किया और कहा कि प्रदान किए गए दस्तावेजों में "काफी गड़बड़ी" है। कोर्ट ने पाया कि मुकदमे के साथ संलग्न स्क्रीनशॉट बेंच के सामने प्रस्तुत यूआरएल (URLs) से मेल नहीं खाते थे, जिसके कारण सुनवाई 9 जुलाई तक के लिए स्थगित कर दी गई। जस्टिस सिंह ने स्पष्ट किया कि वह बेमेल सबूतों के आधार पर कोई आदेश पारित नहीं करेंगी और उन्होंने शर्मा के वकील को एक नया हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया, जिसमें तकनीकी सबूतों को कानूनी दावों के अनुरूप रखा जाए।
विवाद की जड़
मामले के मूल में छवियों में हेरफेर करने के लिए तकनीक का दुरुपयोग है। शर्मा के वकील ने तर्क दिया कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट केवल पैपराजी की तस्वीरें नहीं थीं, बल्कि जानबूझकर एआई (AI) द्वारा बनाई गई हेरफेर का उदाहरण थीं, जिसे उनके निजी जीवन को गलत तरीके से पेश करने के लिए डिजाइन किया गया था। एक विशिष्ट शिकायत में उनके मैनेजर को उनकी रोमांटिक पार्टनर के रूप में गलत तरीके से पहचाने जाने का मुद्दा शामिल है, जिसे कथित तौर पर डिजिटल रूप से बदली गई छवियों के माध्यम से हवा दी गई, जो क्रिकेटर को गलत रोशनी में पेश करती हैं।
मेटा (Meta), जो कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की मूल कंपनी है, के कानूनी प्रतिनिधियों ने कोर्ट को सूचित किया कि याचिका में उल्लिखित कुछ विशिष्ट यूआरएल पहले ही हटा दिए गए हैं या उन तक पहुंच नहीं है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि कुछ सामग्री पैपराजी से आई है—एक ऐसी श्रेणी जिसे अक्सर कानूनी चर्चा में अलग तरह से देखा जाता है—न कि दुर्भावनापूर्ण, तकनीक-संचालित निर्माण के रूप में। अब कोर्ट के सामने चुनौती यह है कि वह एक प्रसिद्ध एथलीट के जीवन में सार्वजनिक हित और किसी व्यक्ति की अपनी पहचान को व्यवस्थित रूप से विकृत होने से रोकने के अधिकार के बीच एक रेखा खींचे।
बड़ी तस्वीर: यह क्यों मायने रखता है
शर्मा का यह कदम एक व्यापक प्रवृत्ति को उजागर करता है: 'पर्सनैलिटी राइट्स' के मुकदमों की लहर। अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन जैसे बॉलीवुड सितारों द्वारा शुरू की गई इसी तरह की कानूनी लड़ाइयों के बाद, न्यायपालिका से डिजिटल भाषण की सीमाओं को परिभाषित करने के लिए लगातार कहा जा रहा है। जैसे-जैसे डीपफेक और इमेज मैनिपुलेशन सस्ते और अधिक सुलभ होते जा रहे हैं, कानूनी प्रणाली उनके साथ तालमेल बिठाने के लिए संघर्ष कर रही है।
सार्वजनिक हस्तियों के लिए दांव ऊंचे होते जा रहे हैं। अब यह केवल किसी ब्रांड या विज्ञापन को नियंत्रित करने के बारे में नहीं है; यह उन एल्गोरिदम से अपनी कहानी वापस लेने के बारे में है जो सच्चाई के बजाय एंगेजमेंट को प्राथमिकता देते हैं। दिल्ली हाई कोर्ट की चुनौती प्रतिष्ठा के मौलिक अधिकार को संतुलित करने और वैध डिजिटल चर्चा को दबाने से बचने के बीच संतुलन बनाने में है। जब तक कोर्ट स्पष्ट मिसाल कायम नहीं करता, तब तक हम और अधिक एथलीटों और अभिनेताओं को डिजिटल विकृतियों से राहत पाने के लिए अदालतों की कतार में देखते रहेंगे।
रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।