आंतरिक कलह और चुनावी चुनौतियों के बीच कांग्रेस में मची खलबली
कांग्रेस ने आज महासचिवों और प्रदेश अध्यक्षों की बैठक बुलाई, मौजूदा राजनीतिक हालातों पर होगी चर्चा
इंदिरा भवन में आज हुई एक उच्च-स्तरीय बैठक ग्रैंड ओल्ड पार्टी के भीतर गहरे होते संकट को दर्शाती है, जो इस समय उम्मीदवारों की अयोग्यता और क्षेत्रीय गुटबाजी से जूझ रही है।
आज राष्ट्रीय राजधानी में राजनीतिक सरगर्मी तेज है क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पार्टी के महासचिवों, राज्य प्रभारियों और प्रदेश अध्यक्षों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन रद्द होने से लेकर कई राज्य इकाइयों में पनप रही बगावत तक, पार्टी को लगातार झटके लग रहे हैं। ऐसे में नेतृत्व पर अपने बिखरते संगठनात्मक ढांचे पर पकड़ मजबूत करने का भारी दबाव है।
इस बैठक का समय महज एक संयोग नहीं है। हालांकि आधिकारिक एजेंडा 'मौजूदा राजनीतिक स्थितियों' पर केंद्रित है, लेकिन इसके पीछे की हलचल कहीं अधिक गंभीर है। जागरण और हिंदुस्तान सहित विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह बैठक डैमेज कंट्रोल की एक कवायद है। पार्टी एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रही है: राज्यसभा में नामांकन रद्द होने के परिणामों को संभालना और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में पार्टी विधायकों द्वारा की जा रही खुली बगावत से निपटना।
चुनौतियों का बढ़ता जाल
कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय परिदृश्य तेजी से अस्थिर हो रहा है। ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (All India Trinamool Congress)—जो विपक्षी गठबंधन का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है—खुद भी आंतरिक उथल-पुथल से गुजर रही है, जहां कई विधायक खुलेआम नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं। इसका असर INDIA गठबंधन की स्थिरता पर पड़ रहा है, क्योंकि कांग्रेस बीजेपी की आक्रामक चुनावी मशीनरी के खिलाफ एकजुट मोर्चा बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है, जो हाल ही में मध्य प्रदेश में जेपी नड्डा के जनसंपर्क अभियान में स्पष्ट रूप से दिखाई दी थी।
इसके अलावा, आजतक की रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि पार्टी की आंतरिक एकजुटता गंभीर तनाव में है। उम्मीदवार सूची को लेकर असंतोष की चर्चाओं—जिसके कारण अक्सर आधी रात को आपातकालीन बैठकें करनी पड़ती हैं—से लेकर पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की तैयारी तक, हाईकमान स्थानीय नेताओं की आकांक्षाओं और केंद्रीय नेतृत्व की रणनीतिक अनिवार्यताओं के बीच संतुलन बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
यह क्यों मायने रखता है
यह बैठक मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए एक 'लिटमस टेस्ट' है कि वे पार्टी को एकजुट रखने में कितने सक्षम हैं। कांग्रेस इस समय प्रतिक्रियावादी राजनीति के चक्र में फंसी हुई है; नैरेटिव सेट करने के बजाय, उसे अपना संसाधन राज्य इकाइयों में लगी आग बुझाने में खर्च करना पड़ रहा है। यदि नेतृत्व आज कोई स्पष्ट रोडमैप देने में विफल रहता है, तो इन स्थानीय विद्रोहों और प्रशासनिक खामियों का असर आगामी विधायी सत्रों से पहले पार्टी की विश्वसनीयता को और कम कर सकता है। यहाँ 'बड़ी तस्वीर' सिर्फ एक चुनाव या एक नामांकन की नहीं है; यह इस बारे में है कि क्या कांग्रेस ऐसे दौर में एक एकजुट राष्ट्रीय शक्ति के रूप में काम कर सकती है जहाँ क्षेत्रीय दरारों को भरना मुश्किल होता जा रहा है।
जैसे-जैसे इंदिरा भवन में बैठक आगे बढ़ रही है, सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या हाईकमान सख्त अनुशासन लागू करेगा या नाराज राज्य नेताओं को खुश करने के लिए सत्ता के विकेंद्रीकरण का प्रयास करेगा। फिलहाल, पार्टी अनिश्चितता की स्थिति में है, जो नाजुक गठबंधन और अपने घर को व्यवस्थित रखने की तत्काल आवश्यकता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।