वक्त कम, चुनौतियां ज्यादा: गुजरात यूनिवर्सिटी के नए VC की नियुक्ति में देरी से बढ़ी चिंता
गुजरात यूनिवर्सिटी के नए कुलपति (VC) की नियुक्ति प्रक्रिया में देरी
नीरजा गुप्ता का कार्यकाल 30 जून को समाप्त हो रहा है, ऐसे में अहमदाबाद के इस प्रतिष्ठित संस्थान में नए उत्तराधिकारी की तलाश समय के साथ दौड़ रही है।
गुजरात यूनिवर्सिटी में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया अब जटिल होती दिख रही है। कुलपति नीरजा गुप्ता के 30 जून को पद छोड़ने की तारीख नजदीक है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर अभी भी चुप्पी छाई हुई है। शिक्षा विभाग ने भले ही 9 जून को तीन सदस्यीय सर्च कमेटी की घोषणा कर दी हो, लेकिन नए प्रमुख की तलाश के लिए आवेदन आमंत्रित करने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हो पाई है।
उत्तराधिकारी खोजने के लिए गठित इस हाई-प्रोफाइल पैनल में एलएम कॉलेज ऑफ फार्मेसी के प्रिंसिपल महेश छाबड़िया, एनआईडी अहमदाबाद के निदेशक अशोक मंडल और यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) का प्रतिनिधित्व कर रहे आईआईटी (ISM) धनबाद के निदेशक सुकुमार मिश्रा शामिल हैं। हालांकि कमेटी का गठन हो चुका है, लेकिन रजिस्ट्रार कार्यालय ने अभी तक शिक्षाविदों से आवेदन मंगाने के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की है।
समय का घटता दायरा
इतने महत्वपूर्ण पद के लिए नियुक्ति की समय-सीमा काफी सख्त होती है। आमतौर पर, एक गहन चयन प्रक्रिया—जिसमें दस्तावेजों की जांच, शॉर्टलिस्ट किए गए उम्मीदवारों के साथ साक्षात्कार और राज्यपाल को तीन नामों का पैनल भेजने की सिफारिश शामिल है—के लिए कम से कम चार से छह सप्ताह का समय चाहिए होता है।
कैलेंडर में बमुश्किल दो सप्ताह का समय बचा है, ऐसे में सुचारू रूप से पदभार सौंपने की संभावना धुंधली होती जा रही है। यूनिवर्सिटी की कार्यप्रणाली से वाकिफ वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि 1 जुलाई तक पूर्णकालिक उत्तराधिकारी का कुर्सी संभालना मुश्किल है। इसने अकादमिक हलकों में इस अटकल को हवा दी है कि सरकार निरंतरता बनाए रखने और राज्य की इस प्रमुख यूनिवर्सिटी में नेतृत्व का शून्य पैदा होने से रोकने के लिए नीरजा गुप्ता को सेवा विस्तार दे सकती है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
नियुक्ति प्रक्रिया में यह देरी उच्च शिक्षा प्रशासन में एक बार-बार आने वाली समस्या को उजागर करती है: प्रशासनिक प्रक्रिया और समय पर नेतृत्व की आवश्यकता के बीच का तनाव। हालांकि 'गुजरात पब्लिक यूनिवर्सिटीज एक्ट' इन चयन प्रक्रियाओं के लिए एक स्पष्ट ढांचा प्रदान करता है, लेकिन नौकरशाही की सुस्ती अक्सर बदलाव की प्रक्रिया को जटिल बना देती है।
जब गुजरात यूनिवर्सिटी जैसा प्रमुख संस्थान अनिश्चितता के दौर से गुजरता है, तो इसका असर दीर्घकालिक नीति कार्यान्वयन और फैकल्टी के मनोबल पर पड़ता है। यह स्थिति अनोखी नहीं है; हाल ही में अन्य राज्यों में भी इसी तरह की देरी के कारण प्रशासनिक नियुक्तियां अटकी हैं, जैसे ओडिशा में कुलपतियों के लिए 10 महीने का लंबा इंतजार। अहमदाबाद के अकादमिक समुदाय के लिए अब सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार खोज प्रक्रिया में तेजी लाएगी या संस्थान के कामकाज को सुचारू रखने के लिए सेवा विस्तार जैसा सुरक्षित और अस्थायी रास्ता चुनेगी।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।