सेंसरशिप का उल्लंघन: 'मॉलिवुड टाइम्स' के मेकर्स पुलिस की रडार पर, अवैध स्क्रीनिंग का आरोप
सेंसर किए गए दृश्यों को थिएटर में दिखाया गया; 'मॉलिवुड टाइम्स' के निर्माता से पुलिस कर रही है पूछताछ
अधिकारियों ने हिट फिल्म की प्रोडक्शन टीम के खिलाफ जांच शुरू कर दी है। आरोप है कि थिएटरों में फिल्म के सेंसर किए गए कंटेंट और आपत्तिजनक संवादों को दिखाया गया।
हाल ही में बॉक्स-ऑफिस पर हिट रही फिल्म मॉलिवुड टाइम्स (Mollywood Times) की टीम के लिए मुश्किलें कानूनी मोड़ ले चुकी हैं। नास्लेन स्टारर इस फिल्म के लिए जो थिएटर रन एक बड़ी सफलता माना जा रहा था, उस पर अब सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) के नियमों के उल्लंघन के गंभीर आरोपों की छाया पड़ गई है। तिरुवनंतपुरम की थिरुवल्लम पुलिस ने क्षेत्रीय सेंसर अधिकारी द्वारा दर्ज कराई गई औपचारिक शिकायत के बाद फिल्म के निर्माता, निर्देशक, वितरक और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स के खिलाफ मामला दर्ज किया है।
मामले की जड़ बोर्ड द्वारा प्रमाणित फिल्म के वर्जन और जनता के लिए प्रदर्शित किए गए वर्जन के बीच बड़ा अंतर होना है। शिकायत के अनुसार, CBFC ने फिल्म को 'UA 16+' सर्टिफिकेट देने के लिए कुछ दृश्यों को हटाने और कुछ संवादों को म्यूट करने का निर्देश दिया था, लेकिन थिएटर रिलीज में कथित तौर पर इन निर्देशों की अनदेखी की गई। रिपोर्ट्स बताती हैं कि टीम ने सेंसर किए गए दृश्यों को वापस जोड़ दिया और प्रतिबंधित ऑडियो को अनम्यूट कर दिया, जिससे नियामक प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ।
लैब से मिले सबूत
पुलिस द्वारा कन्नूर के पय्यानूर सहित विभिन्न प्रयोगशालाओं और सिनेमाघरों में निरीक्षण के बाद जांच ने जोर पकड़ लिया है। जांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जांचकर्ताओं ने प्रयोगशाला के कर्मचारियों से सबूत जुटाए हैं, जिन्होंने कथित तौर पर गवाही दी है कि फिल्म के मेकर्स ने डिजिटल फाइलें वितरण के लिए भेजने से पहले जानबूझकर हटाए गए हिस्सों को दोबारा जोड़ दिया था।
यदि यह साबित हो जाता है, तो यह कृत्य सिनेमैटोग्राफ एक्ट का स्पष्ट उल्लंघन है। इस उल्लंघन के लिए कानूनी परिणाम गंभीर हो सकते हैं, जिसमें तीन साल तक की कैद, एक लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। तिरुवनंतपुरम पुलिस ने निर्माता आशिक उस्मान और निर्देशक अभिनव सुंदर नायक सहित प्रमुख हितधारकों को अपना औपचारिक बयान दर्ज कराने के लिए समन भेजना शुरू कर दिया है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: नियमों की अनदेखी का पैटर्न
यह घटना केरल फिल्म उद्योग में रचनात्मक स्वायत्तता और नियामक निगरानी के बीच बढ़ते घर्षण को उजागर करती है। हालांकि मनोरंजन जगत अक्सर सख्त सेंसरशिप की आवश्यकता पर बहस करता है, लेकिन कानून सर्वोपरि है: सर्टिफिकेट कोई सुझाव नहीं, बल्कि कानूनी प्रदर्शन के लिए एक अनिवार्य शर्त है। जब निर्माता एकतरफा तरीके से उस कंटेंट को बहाल कर देते हैं जिसे एक वैधानिक निकाय ने सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए अनुपयुक्त माना है, तो यह फिल्म प्रमाणन के संस्थागत ढांचे को कमजोर करता है।
यहाँ बड़ी तस्वीर डिजिटल वितरण की जवाबदेही की है। डिजिटल प्रिंट ट्रांसफर करने की आसानी के साथ, सेंसर कट को दरकिनार करने का प्रलोभन बढ़ गया है। हालांकि, यह मामला एक चेतावनी है कि 'थिएट्रिकल कट' अब पहले से कहीं अधिक कड़ी निगरानी में है। उद्योग के लिए, यह संकेत है कि नियामक अब केवल सर्टिफिकेट देने से आगे बढ़ रहे हैं—वे अब सक्रिय रूप से ऑडिट कर रहे हैं कि अंततः दर्शकों तक क्या पहुंच रहा है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी, ध्यान इस बात पर केंद्रित होगा कि क्या यह प्रोडक्शन वर्कफ़्लो में एक व्यवस्थित चूक थी या व्यावसायिक लाभ के लिए कंटेंट में हेरफेर करने का एक जानबूझकर किया गया प्रयास।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।