बयानों से परे: 'फितना अल-हिंदुस्तान' लेबल को लेकर भारत ने UN में पाकिस्तान को घेरा
'नफरत की संगठित फैक्ट्री': समूहों को 'फितना अल-हिंदुस्तान' का दर्जा देने पर भारत ने UN में पाकिस्तान की क्लास लगाई

संयुक्त राष्ट्र में भारत के शीर्ष दूत ने इस्लामाबाद के नए नैरेटिव की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि अलगाववादी समूहों को प्रायोजित तरीके से 'फितना अल-हिंदुस्तान' का नाम देना घरेलू विफलताओं से ध्यान भटकाने की एक सोची-समझी चाल है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का मंच इस सप्ताह तीखी कूटनीतिक बहस का गवाह बना, जब भारत ने पाकिस्तान की सरकारी मशीनरी पर जोरदार हमला बोला। इस विवाद की जड़ में इस्लामाबाद द्वारा बलूचिस्तान स्थित विभिन्न संगठनों को आधिकारिक तौर पर 'फितना अल-हिंदुस्तान' करार देना है—यह एक ऐसा शब्द है जिसमें धार्मिक रंग घुला हुआ है और पाकिस्तानी प्रतिष्ठान इसका इस्तेमाल इन समूहों को राज्य का दुश्मन बताने के लिए कर रहा है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरीश पर्वथनेनी ने दो टूक शब्दों में अपनी बात रखी। उन्होंने इस कदम को 'नफरत की संगठित फैक्ट्री' करार दिया और तर्क दिया कि पाकिस्तान का 'डीप स्टेट' अपने पड़ोसी देश के खिलाफ स्थायी शत्रुता बनाए रखने के लिए दुष्प्रचार का हथियार इस्तेमाल कर रहा है। नई दिल्ली का मानना है कि आंतरिक असंतोष को धार्मिक चश्मे से पेश करके इस्लामाबाद अपनी चरमराती अर्थव्यवस्था और गहरे राजनीतिक संकट से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहा है।
एक सोची-समझी चाल?
क्षेत्रीय मामलों पर नजर रखने वालों के लिए, यह केवल शब्दों की लड़ाई नहीं है। 2025 में आधिकारिक रूप से शुरू किया गया यह दर्जा बलूचिस्तान में सक्रिय कई आतंकवादी संगठनों पर लागू होता है। भारतीय मिशन का कहना है कि यह एक व्यापक और कुटिल रणनीति का हिस्सा है। राष्ट्रीय विमर्श में 'भारत के खतरे' को जीवित रखकर, वहां का सत्ता प्रतिष्ठान अपनी उस विफलता के लिए एक आसान बलि का बकरा ढूंढ लेता है, जिसके चलते वह अपने नागरिकों को बुनियादी शासन या आर्थिक स्थिरता देने में असमर्थ है।
भारतीय दूत ने पाकिस्तान में सत्ता के केंद्रीकरण का मुद्दा भी उठाया, विशेष रूप से असीम मुनीर को पांच साल के कार्यकाल के लिए देश का पहला चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज (CDF) नियुक्त किए जाने का जिक्र किया। 27वें संवैधानिक संशोधन के बाद, नई दिल्ली ने इस कदम को 'अघोषित तख्तापलट' करार दिया है, जो यह दर्शाता है कि सत्ता की बागडोर पर सेना की पकड़ पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई है और लोकतांत्रिक संस्थाएं हाशिए पर चली गई हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह घटनाक्रम वैश्विक मंच पर पाकिस्तान के बयानों को संभालने के भारत के बदलते रुख को दर्शाता है। केवल व्यक्तिगत उकसावे का जवाब देने के बजाय, नई दिल्ली अब 'नफरत की फैक्ट्री' मॉडल की धज्जियां उड़ा रही है। 'फितना अल-हिंदुस्तान' नैरेटिव को सेना के घरेलू नियंत्रण से जोड़कर, भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पाकिस्तान के भारत-विरोधी रुख की असलियत उजागर कर रहा है।
इसके निहितार्थ स्पष्ट हैं: जब तक पाकिस्तान का आंतरिक राजनीतिक अस्तित्व भारत के साथ स्थायी तनाव से जुड़ा रहेगा, तब तक सार्थक बातचीत की संभावना कम है। इसके अलावा, अफगानिस्तान में पाकिस्तान के हालिया हवाई हमलों के दौरान नागरिकों के 'नरसंहार' के खिलाफ भारत का कड़ा रुख यह बताता है कि नई दिल्ली अब इस्लामाबाद की हरकतों को केवल द्विपक्षीय विवाद के बजाय एक व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा खतरे के रूप में पेश करने के लिए तैयार है।
Business Desk at PoliticalPedia covers economy & markets for an Indian audience in English and Hindi.