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ग्रीटिंग कार्ड से आगे: इस फादर्स डे पर सिनेमाई बॉन्डिंग का जादू

फादर्स डे स्पेशल: OTT पर फादर्स डे का आनंद दोगुना करें, पिता के साथ देखें ये 6 फिल्में, तीसरी तो...

द्वारा अनन्या अय्यरप्रकाशित 21 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
ग्रीटिंग कार्ड से आगे: इस फादर्स डे पर सिनेमाई बॉन्डिंग का जादू
ग्रीटिंग कार्ड से आगे: इस फादर्स डे पर सिनेमाई बॉन्डिंग का जादू

जैसे-जैसे परिवार 21 जून की तैयारी कर रहे हैं, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी कहानियों की मांग बढ़ गई है जो पिता-बेटी के रिश्ते की गहराई और कोमलता को दर्शाती हैं।

परफेक्ट गिफ्ट की तलाश अक्सर एक साधारण कार्ड या जल्दबाजी में खरीदे गए गैजेट पर खत्म हो जाती है, लेकिन इस साल ट्रेंड साझा अनुभवों की ओर बढ़ रहा है। 21 जून को फादर्स डे के करीब आते ही, OTT प्लेटफॉर्म उन परिवारों के लिए मुख्य मंच बन गए हैं जो पीढ़ीगत अंतर (generational gap) को पाटना चाहते हैं। हालांकि सोशल मीडिया अभी 'फादर्स डे कोट्स' और भावुक संदेशों से भरा हुआ है, लेकिन असली जश्न लिविंग रूम में मनाया जा रहा है, जहां सिनेमा माता-पिता और बच्चों के बीच अनकही भावनाओं को व्यक्त करने का एक माध्यम बन गया है।

फादर्स डे पर स्ट्रीमिंग कंटेंट का यह विशेष फोकस केवल मनोरंजन के बारे में नहीं है; यह इस बात का प्रतिबिंब है कि हम कहानियों को कैसे देखना पसंद करते हैं। 'पीकू' जैसी फिल्में हमें याद दिलाती हैं कि पिता और बेटी के बीच की खटपट—रोज़ाना की बहस और विचारधाराओं का टकराव—अक्सर गहरी परवाह की एक अलग भाषा होती है। इसी तरह, 'गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल' में पंकज त्रिपाठी का सहज अभिनय पारंपरिक सिनेमाई ढर्रे से हटकर है, जो एक ऐसे पिता को दिखाता है जो शोर मचाने वाले पितृसत्तात्मक व्यक्ति के बजाय एक शांत आधार (anchor) की तरह है।

पितृत्व का सिनेमाई दायरा

वीकेंड के लिए सुझाई गई फिल्मों की सूची विभिन्न मूड और पारिवारिक समीकरणों को ध्यान में रखकर बनाई गई है। जो लोग प्रेरणा की तलाश में हैं, उनके लिए 'दंगल' इस शैली में एक मिसाल है, जो दिखाती है कि एक पिता अपनी बेटियों की सफलता के लिए सामाजिक मानदंडों को चुनौती देने के लिए कितने बड़े त्याग करता है। वहीं दूसरी ओर, थ्रिलर फिल्म 'दृश्यम' माता-पिता की सुरक्षात्मक प्रवृत्ति को दर्शाती है, जो बताती है कि संकट के समय में 'एक अच्छा पिता' होने की परिभाषा अक्सर बदल जाती है।

जो परिवार हल्की-फुल्की फिल्में पसंद करते हैं, उनके लिए 'हे बेबी' अनपेक्षित पितृत्व की मजाकिया लेकिन परिवर्तनकारी यात्रा को दर्शाती है, जबकि 'अंग्रेजी मीडियम' इस बात की मार्मिक याद दिलाती है कि एक माता-पिता अपने बच्चे के सपनों को पूरा करने के लिए किस हद तक जा सकते हैं, चाहे वह सीमा पार ही क्यों न हो। ये फिल्में केवल समय बिताने का साधन नहीं हैं; ये हमारे अपने जीवन का आईना हैं, जो दर्शकों को स्क्रीन पर मौजूद किरदारों में अपने संघर्ष और खुशियां देखने का मौका देती हैं।

यह क्यों मायने रखता है: सांस्कृतिक बदलाव

भारतीय घरों में एक साथ समय बिताने के महत्व को लेकर एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव आया है। हम डिजिटल ट्रिब्यूट्स के दिखावे से हटकर 'सार्थक उपस्थिति' (intentional presence) की ओर बढ़ रहे हैं। पिता-बेटी के रिश्ते की जटिलताओं को उजागर करने वाली फिल्मों को चुनकर, परिवार एक ऐसी जगह बना रहे हैं जहां सीधे टकराव के दबाव के बिना भावनाओं पर चर्चा की जा सकती है।

यह चलन हमारी देखने की आदतों में बढ़ती परिपक्वता को दर्शाता है। हम मेलॉड्रामा के बजाय यथार्थवाद (realism) वाली कहानियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, यह समझते हुए कि सबसे शक्तिशाली कहानियां अक्सर माता-पिता के दैनिक बलिदानों में छिपी होती हैं। जैसे-जैसे OTT प्लेटफॉर्म इन संग्रहों को तैयार कर रहे हैं, वे अनजाने में परिवारों को सही शब्द—या कम से कम सही संदर्भ—ढूंढने में मदद कर रहे हैं ताकि वे उस आभार को व्यक्त कर सकें जो अक्सर अनकहा रह जाता है।

द्वारा अनन्या अय्यर
वैश्विक मामले संवाददाता

अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।