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खेती से आगे: एकीकृत राजस्व मॉडल पर शिवराज सिंह चौहान का जोर

वीडियो: शिवराज सिंह चौहान बोले- एकीकृत खेती अपनाएं, किसानों की आय बढ़ाने पर दें जोर

द्वारा रोहन गुप्ताप्रकाशित 27 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
खेती से आगे: एकीकृत राजस्व मॉडल पर शिवराज सिंह चौहान का जोर
खेती से आगे: एकीकृत राजस्व मॉडल पर शिवराज सिंह चौहान का जोर

जैसे-जैसे केंद्र सरकार ग्रामीण आर्थिक सुरक्षा पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है, उत्तर प्रदेश में कृषि आय के विविधीकरण पर जोर दिया जा रहा है।

लखनऊ के योजना भवन के हॉल हाल ही में एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव के गवाह बने। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उत्तर प्रदेश के कृषि रोडमैप को तैयार करने के लिए राज्य के अधिकारियों के साथ बैठक की और बातचीत को पारंपरिक फसल-केंद्रित विकास से आगे बढ़ाया। उनका संदेश स्पष्ट था: आधुनिक भारतीय किसान अब केवल एक फसल के भरोसे अपना घर नहीं चला सकता। इसके बजाय, अब "एकीकृत खेती" (integrated farming) की ओर रुख करने का समय है।

मंत्री द्वारा रेखांकित इस दृष्टिकोण में खेत को केवल अनाज उगाने की जगह नहीं, बल्कि एक बहु-राजस्व पारिस्थितिकी तंत्र (multi-revenue ecosystem) के रूप में देखा गया है। पशुपालन, बागवानी और मत्स्य पालन को दैनिक कृषि दिनचर्या में शामिल करके, मंत्रालय बाजार की अस्थिरता और अनिश्चित मौसम के खिलाफ एक सुरक्षा कवच तैयार करने की उम्मीद कर रहा है। इसका उद्देश्य इस क्षेत्र को निर्वाह-स्तर के व्यवसाय के बजाय एक उच्च-मूल्य वाले उद्यम में बदलना है।

परिचालन निर्देश

संरचनात्मक सलाह से परे, मंत्री का दौरा प्रशासनिक तात्कालिकता से भरा था। चौहान ने राज्य के अधिकारियों को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि वे वित्तीय सहायता के वितरण को सुव्यवस्थित करें। कई राज्य-स्तरीय कृषि योजनाओं में मुख्य समस्या वितरण में देरी है, जिसके कारण किसान अक्सर बुवाई के महत्वपूर्ण समय पर नकदी के संकट से जूझते हैं। सरकारी सहायता और किस्तों को बिना किसी नौकरशाही बाधा के लाभार्थियों तक पहुँचाने का निर्देश जमीनी स्तर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिर करने का एक प्रयास है।

समय पर वित्तीय सहायता पर यह ध्यान पीएम-किसान (PM-KISAN) जैसी बड़ी केंद्रीय पहलों के अनुरूप है, जिसने ग्रामीण तरलता बनाए रखने के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) पर लगातार ध्यान केंद्रित किया है। जब इन व्यवस्थित भुगतानों को विविध आय स्रोतों के साथ जोड़ा जाता है, तो नीति का उद्देश्य छोटे किसानों को उन प्रणालीगत झटकों से बचाना है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र को प्रभावित किया है।

बड़ी तस्वीर: यह क्यों महत्वपूर्ण है

एकीकृत खेती को बढ़ावा देना ग्रामीण क्षेत्रों में आय वृद्धि के ठहराव के खिलाफ एक सोची-समझी प्रतिक्रिया है। वर्षों से, कृषि क्षेत्र "उत्पादकता-आय अंतराल" से जूझ रहा है—जहाँ उपज में सुधार का मतलब हमेशा घरेलू संपत्ति में वृद्धि नहीं होता है। एक ऐसा मॉडल अपनाकर जहाँ किसान पारंपरिक फसलों के साथ-साथ दूध, फल और मछली भी बेचता है, सरकार अनिवार्य रूप से "जोखिम कम करने" (de-risking) की रणनीति को प्रोत्साहित कर रही है।

हालाँकि, इस बदलाव को स्थानीय स्तर पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जैसा कि छतरपुर जैसे क्षेत्रों में हाल के घटनाक्रमों में देखा गया है, जहाँ केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना जैसी बड़ी परियोजनाओं के लिए भूमि सर्वेक्षण के मुद्दों ने विरोध को जन्म दिया है, सुधार की राह कभी भी आसान नहीं होती। जब किसानों को लगता है कि उनकी प्राथमिक संपत्ति—जमीन—से समझौता किया जा रहा है या उसका कम मूल्यांकन किया गया है, तो एकीकृत खेती की बेहतरीन योजनाएं भी मुश्किल में पड़ सकती हैं। वर्तमान रोडमैप की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशासन इन बड़े संरचनात्मक सुधारों और जमीन व मुआवजे से जुड़े उन दैनिक मुद्दों के बीच कैसे संतुलन बनाता है, जो किसानों को आंदोलित रखते हैं।

द्वारा रोहन गुप्ता
बिज़नेस संवाददाता

रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।