सीमाओं से परे: केरल स्वास्थ्य सोसाइटी तमिल में विज्ञापन क्यों दे रही है?
‘എന്തിനാണ് ഈ പരസ്യം?’; केरल सरकार की स्वास्थ्य सोसाइटी का तमिल अखबारों में विज्ञापन
राज्य की स्वास्थ्य इकाई द्वारा तमिल भाषा के समाचार पत्रों में विज्ञापन देने के इस हैरान करने वाले कदम ने वित्तीय विवेक और लक्षित दर्शकों की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला तब सामने आया जब एक पाठक ने सुबह की चाय के साथ तमिल दैनिक अखबार पलटा, तो उसे केरल स्वास्थ्य अनुसंधान और कल्याण सोसाइटी (KHRWCS) का एक पूरा पन्ने का विज्ञापन दिखाई दिया। मुख्य रूप से केरल के लोगों की सेवा के लिए बनी एक सरकारी इकाई के लिए, राज्य की सीमा के बाहर क्षेत्रीय विज्ञापन में निवेश करने के फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे दौर में जब सार्वजनिक खर्च के हर रुपये पर नजर रखी जा रही है, गैर-मलयालम भाषी आबादी तक पहुंचने के पीछे का तर्क समझ से परे है।
ऑडिट ट्रेल
केरल सरकार, विशेष रूप से इसके स्वास्थ्य विभाग की प्रशासनिक कार्यप्रणाली अक्सर जांच के दायरे में रहती है, लेकिन यह मामला नीति और पहुंच के बीच एक अजीबोगरीब अंतर को उजागर करता है। हालांकि आधिकारिक संचार सामान्य है, लेकिन राज्य के भाषाई अधिकार क्षेत्र से बाहर मीडिया आउटलेट्स का चयन आवंटन में निगरानी की कमी का संकेत देता है। जब करदाता स्थानीय कल्याण के लिए बनी सोसाइटी को फंड देते हैं, तो यह स्वाभाविक उम्मीद होती है कि प्रचार बजट का उपयोग राज्य के भीतर ही हो ताकि उसका अधिकतम प्रभाव पड़े। इसके बजाय, पड़ोसी मीडिया बाजारों में यह कदम सामान्य ज्ञान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
जैसा कि manoramaonline और अन्य प्लेटफॉर्मों की हालिया रिपोर्टों में उल्लेख किया गया है, यह केवल कुछ प्रिंट स्लॉट की लागत का मामला नहीं है। यह सरकारी निकायों द्वारा अपनी आउटरीच रणनीति तय करने में पारदर्शिता की प्रणालीगत आवश्यकता की ओर इशारा करता है। यदि केरल सरकार यह उम्मीद करती है कि जनता उसकी प्रीमियम सेवाओं या स्वास्थ्य पहलों पर भरोसा करे, तो ऐसे खर्चों के पीछे का तर्क स्पष्ट होना चाहिए। क्या तमिलनाडु में किसी विशिष्ट रोगी वर्ग को लक्षित किया जा रहा है? या यह केवल एक प्रशासनिक चूक है जो नजरों से बच गई?
यह क्यों मायने रखता है
यह घटना एक बड़े मुद्दे का छोटा रूप है: सरकारी विज्ञापन खर्च में जवाबदेही की कमी। चाहे यह धन के दुरुपयोग का अपराध हो या केवल नौकरशाही की लापरवाही, सार्वजनिक चर्चा—संपादकीय कॉलम से लेकर संडे सप्लीमेंट्स तक—बेहतर जवाब मांग रही है। केवल ऑडिट रिपोर्ट का html लिंक प्रकाशित करना पर्याप्त नहीं है; हर प्रचार रुपये का उद्देश्य और उपयोग न्यायोचित होना चाहिए।
बड़ी तस्वीर वित्तीय जिम्मेदारी की है। जब संसाधन सीमित हों, तो हर प्रशासनिक निर्णय सरकार की प्राथमिकताओं को दर्शाता है। यदि लक्ष्य क्षेत्रीय एकीकरण या सीमा पार स्वास्थ्य जागरूकता था, तो संचार रणनीति स्पष्ट और स्थानीय होनी चाहिए थी। तमिल विज्ञापनों को सही ठहराने में विफल रहकर, स्वास्थ्य सोसाइटी ने अनजाने में संदेह को आमंत्रित किया है, जो यह साबित करता है कि डिजिटल युग में, एक गलत जगह दिया गया विज्ञापन नीतिगत विफलता की तरह ही स्पष्ट दिखाई देता है।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।