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बीजिंग का सख्त रुख: चीन ने इजरायल से गाजा में सैन्य अभियान तुरंत रोकने की मांग की

इजरायल का सैन्य अभियान तुरंत बंद हो: चीन

द्वारा अनन्या अय्यरप्रकाशित 22 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
बीजिंग का सख्त रुख: चीन ने इजरायल से गाजा में सैन्य अभियान तुरंत रोकने की मांग की
बीजिंग का सख्त रुख: चीन ने इजरायल से गाजा में सैन्य अभियान तुरंत रोकने की मांग की

अक्टूबर में हुए संघर्षविराम समझौते के तार-तार होने के बाद, चीन ने संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के खिलाफ अपने रुख को और कड़ा कर लिया है और अमेरिका पर कूटनीतिक दोहरेपन का आरोप लगाया है।

मध्य पूर्व में पहले से ही नाजुक स्थिति को एक और बड़ा झटका लगा है। इस सोमवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के एक उच्च-स्तरीय आपातकालीन सत्र में वैश्विक चर्चा ने अचानक रुख बदल लिया, जब चीन ने स्पष्ट शब्दों में मांग की: गाजा में सैन्य अभियान तुरंत बंद होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र में चीन के स्थायी प्रतिनिधि फू कांग ने बिना किसी लाग-लपेट के मौजूदा स्थिति को एक गंभीर मानवीय त्रासदी करार दिया, जो पिछले अक्टूबर में अमेरिका की मध्यस्थता में हुए संघर्षविराम की शर्तों का उल्लंघन है।

संयुक्त राष्ट्र में कूटनीतिक टकराव

संयुक्त राष्ट्र का यह सत्र वैश्विक शक्तियों के बीच एक दुर्लभ और सीधे टकराव का मंच बन गया। जहां अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब तक पर्दे के पीछे की कूटनीति में उलझा हुआ था, वहीं चीनी प्रतिनिधिमंडल का यह सार्वजनिक बयान उनकी सामान्यतः सतर्क रहने वाली नीति से एक स्पष्ट बदलाव है। फू कांग ने संकेत दिया कि बीजिंग इजरायल के जमीनी अभियानों के विस्तार को लेकर बेहद चिंतित है और उन्होंने सभी पक्षों—विशेषकर तेल अवीव—से संघर्षविराम की मूल शर्तों का पालन करने का आह्वान किया।

यह आलोचना केवल जमीनी संघर्ष तक सीमित नहीं रही। चीन ने वाशिंगटन पर निशाना साधते हुए कहा कि अमेरिका एक तरफ शांतिदूत होने का दिखावा कर रहा है, तो दूसरी तरफ वह इस सैन्य अभियान को जारी रखने के लिए जरूरी कूटनीतिक और रणनीतिक समर्थन दे रहा है। यह नैरेटिव शिफ्ट विश्व की शक्तियों को एक अनिश्चित स्थिति में डाल देता है, क्योंकि तनाव का प्राथमिक स्रोत वादों और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ती खाई है।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

यह तनाव केवल एक कूटनीतिक विवाद नहीं है; यह एक व्यापक रणनीतिक बदलाव को दर्शाता है। संघर्षविराम के रक्षक के रूप में खुद को पेश करके, बीजिंग प्रभावी रूप से क्षेत्रीय मध्यस्थता पर अमेरिका के एकाधिकार को चुनौती दे रहा है। ई-पेपर की रिपोर्टों और इन घटनाओं की अंग्रेजी कवरेज पर नजर रखने वाले पर्यवेक्षकों के लिए यह स्पष्ट है कि संघर्षविराम अब केवल एक स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है। यह मध्य पूर्व में वैश्विक महाशक्तियों के प्रभाव का बैरोमीटर बन गया है।

यदि अमेरिका हिंसा को फिर से भड़कने से नहीं रोक पाता है, तो उसकी मध्यस्थता प्रयासों की विश्वसनीयता—जो होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी बातचीत के कारण पहले ही दबाव में है—और अधिक कमजोर हो सकती है। यहां एक पैटर्न साफ है: जैसे-जैसे मानवीय संकट गहरा रहा है, अंतरराष्ट्रीय धैर्य जवाब दे रहा है। क्या यह दबाव वास्तविक नीतिगत बदलाव में बदलेगा, यह देखना बाकी है, लेकिन शांत कूटनीतिक चालों का दौर समाप्त होता दिख रहा है।

क्षेत्रीय प्रभाव

इस नई अस्थिरता का असर केवल गाजा तक सीमित नहीं है। पूरे क्षेत्र से आ रही रिपोर्टें व्यापक सुरक्षा बिगड़ने का संकेत दे रही हैं, जिसमें लेबनान में सीमा पार झड़पें और ईरान से जुड़े तनाव के फैलने का खतरा है। जैसा कि मूल लेख के आंकड़े बताते हैं, हर बार जब संघर्षविराम का उल्लंघन होता है, तो एक स्थायी और बहुपक्षीय समाधान की संभावना कम हो जाती है। इस सोमवार से शुरू हुए सप्ताह में, पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या संयुक्त राष्ट्र की ये सख्त चेतावनी कोई असर दिखाएगी या हिंसा का चक्र ही क्षेत्र में आगे की दिशा तय करता रहेगा।

द्वारा अनन्या अय्यर
वैश्विक मामले संवाददाता

अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।