अलीगंज में तबाही: लखनऊ अग्निकांड की SIT जांच शुरू, गरमाई सियासत
SIT ने लखनऊ अग्निकांड स्थल का निरीक्षण किया; कांग्रेस ने इस त्रासदी के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया

दो सदस्यीय जांच टीम ने अलीगंज की जली हुई कमर्शियल बिल्डिंग का मुआयना किया। इस बीच, सुरक्षा में चूक के चलते 15 लोगों की मौत के मामले में अधिकारियों को निलंबित किया गया है और सवाल उठ रहे हैं।
लखनऊ के अलीगंज इलाके में तीन मंजिला कमर्शियल बिल्डिंग का काला पड़ चुका ढांचा शहर की सुरक्षा व्यवस्था की विफलता का एक भयावह प्रतीक बन गया है। सोमवार, 22 जून 2026 को इस कॉम्प्लेक्स में लगी भीषण आग ने सब कुछ राख कर दिया। इस बिल्डिंग में ग्राफिक्स एनिमेशन सेंटर, पेट शॉप और लाइब्रेरी चल रही थी। इस हादसे में कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई और पांच अन्य जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। मंगलवार सुबह, एक विशेष जांच दल (SIT) घटनास्थल पर पहुंची और यह पता लगाने की प्रक्रिया शुरू की कि आखिर चूक कहां हुई।
पर्यटन और संस्कृति विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अमृत अभिजात और लखनऊ जोन के ADG प्रवीण कुमार के नेतृत्व में SIT ने एक घंटे से अधिक समय तक जले हुए परिसर का बारीकी से निरीक्षण किया। उनके साथ उत्तर प्रदेश फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) के विशेषज्ञों ने मलबे की छानबीन की और जले हुए बिजली के तारों व उपकरणों को कब्जे में लिया, जिनसे आग के कारणों का पता चल सकता है। आपातकालीन निकास न होने वाली इमारतों के लिए पहले ही डिमोलिशन नोटिस जारी किए जा चुके हैं, ऐसे में जांच अब केवल आग लगने के कारणों तक सीमित नहीं है, बल्कि उस व्यवस्थागत खामी की भी पड़ताल की जा रही है जिसने ऐसी खतरनाक इमारत को संचालित होने दिया।
जवाबदेही का संकट
प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई तेजी से हुई है। चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है और चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है। दिलचस्प बात यह है कि जवाबदेही का मामला तब और उलझ गया जब एक निलंबित फायर ऑफिसर, जिसने पहले अपने वरिष्ठों पर लापरवाही का आरोप लगाया था, ने अपने बयान वापस ले लिए। विभाग के भीतर इस बदलते रुख ने नियामक निगरानी की कमी को लेकर संदेह के बादल और गहरे कर दिए हैं।
इस मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब उत्तर प्रदेश कांग्रेस ने राज्य सरकार को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया। पार्टी अध्यक्ष अजय राय ने सार्वजनिक रूप से इस घटना को प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम बताया है। उनका तर्क है कि यदि बुनियादी सुरक्षा मानकों का पालन किया जाता, तो इन लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
यह घटना भारत के टियर-2 शहरों में एक आवर्ती और खतरनाक पैटर्न को उजागर करती है: आवासीय या मिश्रित उपयोग वाली इमारतों को बिना फायर सेफ्टी इंफ्रास्ट्रक्चर के अपग्रेड किए तेजी से कमर्शियल हब में बदलना। जब शिक्षा केंद्र और लाइब्रेरी ऐसी इमारतों में भरे होते हैं जिनमें बुनियादी आपातकालीन निकास नहीं होते, तो यह एक बड़ी आपदा को न्योता देने जैसा है। SIT की चल रही जांच को केवल व्यक्तिगत दोष तय करने से आगे बढ़कर नगर निगम की उस उदासीनता पर भी सवाल उठाना चाहिए, जिसके कारण ऐसी 'डेथ ट्रैप' इमारतें सबके सामने मौजूद हैं। लखनऊ के पीड़ित परिवारों के लिए, अंतिम रिपोर्ट इस बात की परीक्षा होगी कि क्या राज्य की जांच मशीनरी राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर वास्तविक संस्थागत जवाबदेही तय कर पाती है।
जैसे-जैसे टीम किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में पीड़ितों का साक्षात्कार लेने और विभिन्न विभागों से गवाही जुटाने की तैयारी कर रही है, सरकार द्वारा निर्धारित समय सीमा को पूरा करने का दबाव बढ़ रहा है। फिलहाल, सबूत और अनसुलझे सवाल अलीगंज के जले हुए अवशेषों में दबे हुए हैं।
अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।