मानसून की एक और त्रासदी: मुंबई में पेड़ गिरने से एक और व्यक्ति की मौत
मुंबई में बारिश का कहर: कुर्ला में पेड़ गिरने से 63 वर्षीय व्यक्ति की मौत
मुंबई में लगातार जारी रेड अलर्ट के बीच कुर्ला में पेड़ गिरने से 63 वर्षीय एक व्यक्ति की मौत हो गई है।
मुंबई में मानसून का मौसम अक्सर धैर्य की परीक्षा जैसा होता है, लेकिन इस हफ्ते शहर की सहनशक्ति टूटती हुई नजर आई। मूसलाधार बारिश के बीच, कुर्ला में एक 63 वर्षीय व्यक्ति ने दुकान में शरण ली थी, तभी अचानक एक पेड़ उनके ऊपर गिर गया, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। चेंबूर में हुई ऐसी ही एक घटना के कुछ ही दिनों बाद हुई इस त्रासदी ने पूरे शहर में शोक और आक्रोश फैला दिया है।
संकट में घिरा शहर
आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। इस मौत के साथ ही शहर में मानसून से जुड़ी मौतों का आंकड़ा दस तक पहुंच गया है, जिनमें से कम से कम तीन मौतें सीधे तौर पर पेड़ गिरने के कारण हुई हैं। मुंबई महानगर क्षेत्र में हर तरफ अफरा-तफरी का माहौल है: भारी बारिश के कारण महज चार दिनों में ही जुलाई की औसत बारिश का 80% पानी बरस चुका है। वसई-विरार से लेकर शहर की जलमग्न सड़कों तक, जहां बचाव दल 200 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए मजबूर हुए, बुनियादी ढांचा इस भारी बारिश के सामने संघर्ष करता दिख रहा है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 'रेड' अलर्ट जारी रखा है और निवासियों से घर के अंदर रहने की अपील की है। हालांकि, हजारों मुंबईकरों के लिए घर पर रहना संभव नहीं है। यह शहर ऐसा है जहां रोजाना का सफर एक अनिवार्य जोखिम बना हुआ है। जब कोई पेड़ गिरता है, तो यह केवल प्रकृति का प्रकोप नहीं होता; यह जलवायु परिवर्तन के दौर में मानसून की तीव्रता के सामने शहर के शहरी वनीकरण प्रबंधन के संघर्ष को दर्शाता है।
यह महत्वपूर्ण क्यों है
पेड़ गिरने की बार-बार होने वाली ये घटनाएं शहरी रखरखाव में प्रणालीगत विफलता की ओर इशारा करती हैं। हालांकि तेज हवाएं और बारिश इसके तात्कालिक कारण हैं, लेकिन पेड़ों के गिरने का मुख्य कारण अक्सर कमजोर जड़ें, उपयोगिताओं के लिए अवैध खुदाई और मानसून से पहले पेड़ों की उचित छंटाई न होना है। हर साल, नगर प्रशासन ऑडिट और सुरक्षित हरित आवरण का वादा करता है, लेकिन 'एक और' त्रासदी का दोहराव यह बताता है कि केवल प्रतिक्रियात्मक उपाय अब पर्याप्त नहीं हैं।
सार्वजनिक चर्चा अब तीखी होती जा रही है। सोशल मीडिया पर अव्यवस्था की खबरें छाई हुई हैं और इन रोकी जा सकने वाली मौतों के प्रति कथित उदासीनता के लिए राजनीतिक हस्तियों को आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। जैसे-जैसे शहर रेड अलर्ट के इस दौर से गुजर रहा है, ध्यान केवल मलबा हटाने से हटकर सार्वजनिक रास्तों और दुकानों के पास खड़े खतरनाक पेड़ों के साल भर चलने वाले सख्त ऑडिट पर केंद्रित होना चाहिए। जब तक शहर का बुनियादी ढांचा मौसम की तीव्रता का मुकाबला करने के लिए तैयार नहीं होता, तब तक मानसून इसी तरह भारी कीमत वसूलता रहेगा।
कबीर शर्मा पॉलिटिकलपीडिया के लिए संस्कृति, तकनीक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लिखते हैं।