आंध्र प्रदेश में उर्वरक वितरण अब APAIMS ऐप के जरिए: किसानों के लिए डिजिटल बदलाव
किसानों के लिए अलर्ट - अब यूरिया और डीएपी का वितरण होगा ऐप के माध्यम से
सोमवार से, राज्य सरकार यूरिया और डीएपी के आवंटन को सुव्यवस्थित करने के लिए अपने विशेष ऐप के उपयोग को अनिवार्य कर देगी, हालांकि बटाईदार किसानों को शामिल करने को लेकर अभी भी सवाल बरकरार हैं।
आंध्र प्रदेश सरकार सोमवार से अपनी कृषि आपूर्ति श्रृंखला में बड़ा बदलाव करने जा रही है, जिसके तहत यूरिया और डीएपी जैसे आवश्यक उर्वरक (Fertilizer) के वितरण को डिजिटल मॉडल पर शिफ्ट किया जा रहा है। राज्य के कृषि विभाग द्वारा विकसित 'एग्रीकल्चर प्रोड्यूस एंड इनपुट्स मैनेजमेंट सिस्टम' (APAIMS) ऐप के माध्यम से, सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि किसानों को उनकी जरूरत के अनुसार ही खाद मिले, जिससे जमाखोरी और आपूर्ति में हेरफेर को रोका जा सके।
यह प्रणाली सटीकता के लिए बनाई गई है। एक बार जब कोई भूमि मालिक अपने आधार नंबर के माध्यम से पंजीकरण करता है, तो ऐप स्वचालित रूप से 'वेबलैंड' डेटाबेस से भूमि रिकॉर्ड प्राप्त कर लेता है। इसके बाद किसान अपनी फसल की योजना दर्ज कर सकते हैं, और सिस्टम उर्वरक की विशिष्ट आवश्यकता की गणना करेगा, जिससे आपूर्ति किस्तों में आवंटित की जाएगी। उपयोगकर्ता इंटरफ़ेस के माध्यम से अपने पसंदीदा स्थानीय विक्रेता का चयन कर सकते हैं और ओटीपी-आधारित प्रमाणीकरण प्रक्रिया का उपयोग करके खरीदारी पूरी कर सकते हैं।
कार्यान्वयन और अपवाद
हालांकि यह पहल 26 जिलों में शुरू की जा रही है, लेकिन कृष्णा और काकीनाडा जिलों को इससे छूट दी गई है। ये क्षेत्र वर्तमान में केंद्र सरकार द्वारा संचालित एक अलग पायलट प्रोजेक्ट में भाग ले रहे हैं, जो एक अलग केंद्रीकृत पोर्टल का उपयोग करता है। कृषि विभाग के निदेशक मनाजिर जिलानी समून ने स्थानीय अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे किसानों, किसान संघों और उर्वरक डीलरों के लिए जागरूकता अभियान चलाएं ताकि इस डिजिटल बुनियादी ढांचे में बदलाव सुचारू रूप से हो सके।
बटाईदार किसानों की दुविधा
आधुनिकीकरण के इस प्रयास के बावजूद, यह रणनीति राज्य के लगभग 22 लाख बटाईदार किसानों के लिए एक बड़ी बाधा का सामना कर रही है। हालांकि सरकार का कहना है कि उर्वरक तक पहुंच ई-क्रॉप बुकिंग और कल्टीवेटर चिट्स (CCRC) के माध्यम से प्रबंधित की जाएगी, लेकिन समय सीमा को लेकर अनिश्चितता है। राजस्व और कृषि अधिकारी आमतौर पर जुलाई या अगस्त में ये दस्तावेज जारी करना शुरू करते हैं—जो अक्सर खरीफ सीजन के अंतिम चरण के साथ मेल खाता है। यदि दस्तावेजीकरण प्रक्रिया में देरी होती है, तो हजारों बटाईदार किसान अपनी फसल बोने के लिए आवश्यक सब्सिडी वाले इनपुट प्राप्त करने में असमर्थ हो सकते हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह बदलाव राज्य के शासन में एक व्यापक रुझान को दर्शाता है: कृषि इनपुट के लिए डेटा-संचालित, सीधे उपभोक्ता तक वितरण प्रणाली की ओर कदम। भूमि रिकॉर्ड को सीधे इन्वेंट्री प्रबंधन से जोड़कर, प्रशासन पारंपरिक और अस्पष्ट वितरण चैनलों को एक पारदर्शी, आधार-सत्यापित लेजर से बदलने का प्रयास कर रहा है। हालांकि, इस मॉडल की सफलता ऐप की जटिलता से नहीं, बल्कि इसकी समावेशिता से मापी जाएगी। यदि यह डिजिटल प्रणाली अनजाने में उन लोगों के लिए बाधा पैदा करती है जिनके पास स्पष्ट मालिकाना हक नहीं है या जो धीमे दस्तावेजीकरण का इंतजार कर रहे हैं, तो यह नीति अनजाने में राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में असमानता की खाई को और बढ़ा सकती है।
अर्जुन मेहता पॉलिटिकलपीडिया के लिए सरकार, नीति और संसद पर रिपोर्ट करते हैं।