Politicalpedia
मनोरंजन

अल्फा रिव्यू: आलिया भट्ट की दमदार एक्टिंग और घिसी-पिटी स्पाई कहानी का टकराव

‘अल्फा’ मूवी रिव्यू: आलिया भट्ट ने अपनी एक्टिंग से जान फूंकी, लेकिन फिल्म का फॉर्मूला पुराना है

द्वारा रोहन गुप्ताप्रकाशित 4 जुलाई 2026· 2 मिनट पढ़ें
अल्फा रिव्यू: आलिया भट्ट की दमदार एक्टिंग और घिसी-पिटी स्पाई कहानी का टकराव
अल्फा रिव्यू: आलिया भट्ट की दमदार एक्टिंग और घिसी-पिटी स्पाई कहानी का टकराव

YRF का यह नया प्रोजेक्ट अपने स्पाई यूनिवर्स में जेंडर इक्वालिटी तो लाता है, लेकिन एक साधारण पटकथा इस हाई-स्टेक थ्रिलर को ऊंचाई तक पहुंचने से रोक देती है।

YRF स्पाई यूनिवर्स आधिकारिक तौर पर अपने "सुपरहीरो" चरण में पहुंच गया है, जो एक ऐसा भीड़भाड़ वाला मैदान बन चुका है जहां हर बड़े स्टार को प्रासंगिक बने रहने के लिए एक बैज की जरूरत है। इस हफ्ते, सारा ध्यान आलिया भट्ट पर है, जो एक जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑपरेटिव के रूप में मुख्य भूमिका निभा रही हैं। जैसे-जैसे alpha movie 2026 को लेकर ऑनलाइन चर्चाएं बढ़ रही हैं, यह स्पष्ट है कि यश राज फिल्म्स पारंपरिक पुरुष-प्रधान पदानुक्रम से आगे बढ़कर अपनी लिस्ट का विस्तार करने पर दांव लगा रहा है। यहां, भट्ट केंद्र में हैं, जिन पर एक बड़े बजट की फिल्म का भार है, जो पिछले दशक में इस शैली की फिल्मों में महिलाओं को मिलने वाली छोटी भूमिकाओं से बिल्कुल अलग है।

निर्देशक शिव रवैल ने प्राचीन भारतीय पौराणिक कथाओं को मार्वल जैसी हाई-ऑक्टेन शैली के साथ जोड़ने की कोशिश की है, लेकिन परिणाम अक्सर वही पुराना मिश्रण लगता है जिसे हम पहले कई बार देख चुके हैं। story एक परिचित रास्ते पर चलती है: एक बागी मेंटर, सुपर-सोल्जर्स से जुड़ा एक गुप्त सरकारी प्रोजेक्ट, और एक देशभक्तिपूर्ण बैकड्रॉप जिसमें बॉबी देओल पर्दे के पीछे से खेल खेलते नजर आते हैं। दांव ऊंचे होने के बावजूद, कहानी में नयापन नहीं है, जिससे दर्शक यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या यह फ्रेंचाइजी अब अपनी लय खो रही है।

दमदार अभिनय की नींव

अगर इस movie को देखने का कोई एक कारण है, तो वह है सीता के किरदार में आलिया भट्ट की पूरी प्रतिबद्धता। उन आम एक्शन स्टार्स के विपरीत जो केवल एक भावहीन चेहरे पर निर्भर रहते हैं, आलिया अपने चेहरे के हाव-भाव से एक्शन को बयां करती हैं। हर पंच और किक व्यक्तिगत लगती है, जैसे शास्त्रीय नृत्य में अभिनय हो। वह एक शिकारी जैसी तेज आत्मविश्वास और एक अनाथ की संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाती हैं, जिससे उनका किरदार कॉमिक-स्ट्रिप के किसी वन-डायमेंशनल प्रॉप जैसा नहीं लगता।

हालांकि यह review एक्शन दृश्यों की तकनीकी दक्षता की तारीफ करता है, लेकिन उदय चोपड़ा, श्रीधर राघवन और इशिता मोइत्रा की पटकथा फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी बनी हुई है। यह फिल्म जरूरी पड़ावों को तो छूती है, लेकिन शायद ही कभी चौंकाती है। fight सीन देखने में शानदार और कुशल हैं, फिर भी फिल्म अक्सर ऐसी लगती है जैसे यह किसी स्टूडियो की चेकलिस्ट को पूरा कर रही हो, न कि कोई नई और सम्मोहक कहानी सुना रही हो।

यह क्यों मायने रखता है

यहां बड़ा ट्रेंड साफ है: हिंदी फिल्म इंडस्ट्री वैश्विक फिल्मों का मुकाबला करने के लिए अपना खुद का इंटरकनेक्टेड सिनेमैटिक यूनिवर्स बनाने की कोशिश कर रही है। ऐसी हाई-स्टेक फिल्म में एक महिला को लीड रोल में रखकर, स्टूडियो जेंडर इक्वालिटी की ओर एक बदलाव का संकेत दे रहा है, यह साबित करते हुए कि एक महिला किसी पुरुष सह-कलाकार के बिना भी स्पाई फ्रेंचाइजी को संभाल सकती है। हालांकि, bigger picture यह बताता है कि केवल स्टार पावर कहानी में नवीनता की कमी को नहीं छिपा सकती। जैसे-जैसे दर्शक समझदार हो रहे हैं, फिल्म निर्माण का यह "भीड़भाड़ वाला" तरीका जल्द ही दीवार से टकरा सकता है, अगर स्क्रिप्ट्स पुराने घिसे-पिटे फॉर्मूलों और बिना मौलिकता वाली दुनिया पर ही निर्भर रहीं।

द्वारा रोहन गुप्ता
बिज़नेस संवाददाता

रोहन गुप्ता पॉलिटिकलपीडिया के लिए अर्थव्यवस्था, बाज़ार और कंपनियों को कवर करते हैं।