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प्रशासनिक अतिरेक या न्यायिक आवश्यकता? NCLT के ट्रांसफर अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का मंथन

NCLT ट्रांसफर पर गुजरात हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली केंद्र की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

द्वारा अनन्या अय्यरप्रकाशित 16 जून 2026· 2 मिनट पढ़ें
प्रशासनिक अतिरेक या न्यायिक आवश्यकता? NCLT के ट्रांसफर अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का मंथन
प्रशासनिक अतिरेक या न्यायिक आवश्यकता? NCLT के ट्रांसफर अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का मंथन

सुप्रीम कोर्ट ने ArcelorMittal Nippon Steel India को एक महत्वपूर्ण मामले में नोटिस जारी किया है, जो NCLT अध्यक्ष के एक राज्य से दूसरे राज्य में केस ट्रांसफर करने के अधिकार से जुड़ा है।

एक कानूनी लड़ाई को एक शहर से दूसरे शहर में स्थानांतरित करने का निर्णय सुनने में भले ही एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लगे, लेकिन नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के गलियारों में इसने संवैधानिक खींचतान पैदा कर दी है। सोमवार को, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए ArcelorMittal Nippon Steel India Private Limited को नोटिस जारी किया। विवाद की जड़ में केंद्र सरकार की वह चुनौती है, जिसमें गुजरात हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसने NCLT अध्यक्ष की केस ट्रांसफर करने की शक्तियों पर लगाम लगा दी थी।

यह विवाद NCLT अध्यक्ष द्वारा स्टील दिग्गज से जुड़े मामलों को अहमदाबाद बेंच से मुंबई बेंच में स्थानांतरित करने के निर्णय से शुरू हुआ। जब 2024 में अहमदाबाद की दो अलग-अलग बेंचों ने खुद को मामले से अलग कर लिया, तो अध्यक्ष ने NCLT नियम, 2016 के नियम 16(d) का उपयोग करते हुए मुकदमे को मुंबई स्थानांतरित कर दिया। हालांकि, गुजरात हाई कोर्ट ने, जिसे बाद में एक डिवीजन बेंच ने भी बरकरार रखा, इन ट्रांसफर को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट का तर्क था कि नियम 16(d) अध्यक्ष को क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (territorial jurisdiction) को दरकिनार करने का असीमित अधिकार नहीं देता है।

केंद्र का तर्क

केंद्र सरकार अब सुप्रीम कोर्ट से उस व्याख्या को पलटने का आग्रह कर रही है। सरकारी वकीलों का तर्क है कि हाई कोर्ट ने नियमों में कृत्रिम भौगोलिक बाधाएं जोड़कर गलती की है। केंद्र का रुख यह है कि NCLT पूरे भारत में एक एकल, एकीकृत न्यायिक निकाय के रूप में कार्य करता है, न कि स्वतंत्र क्षेत्रीय इकाइयों के समूह के रूप में।

सरकार के नजरिए से, बेंच केवल प्रशासनिक सुविधा और वादियों की पहुंच के लिए एक व्यवस्था है। उनका तर्क है कि यदि NCLT अध्यक्ष केस ट्रांसफर नहीं कर सकते—विशेष रूप से तब जब जज खुद को अलग कर लें या पद खाली हों—तो ट्रिब्यूनल की समय पर न्याय देने की क्षमता प्रभावी रूप से पंगु हो जाएगी। यदि हर बार जज के हटने पर काम रुक जाए, तो कॉर्पोरेट दिवाला समाधान (insolvency resolution) की प्रक्रिया ठप हो जाएगी।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है

यह मामला इस बात का संकेत है कि भारत के विशेष ट्रिब्यूनल कैसे काम करेंगे। यदि सुप्रीम कोर्ट गुजरात हाई कोर्ट के दृष्टिकोण को बरकरार रखता है, तो यह एक कठोर मिसाल बन सकती है, जिससे NCLT को सख्त क्षेत्रीय सीमाओं में बंधना पड़ेगा। इससे स्थानीय जवाबदेही तो सुनिश्चित हो सकती है, लेकिन जब स्थानीय बेंचों पर काम का बोझ बढ़ जाए या जैसा कि इस मामले में हुआ, वे सुनवाई के लिए अयोग्य हो जाएं, तो इससे बड़े पैमाने पर न्यायिक बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं।

व्यावसायिक समुदाय और कानूनी विशेषज्ञों के लिए—जो अक्सर LiveLawBiz जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से इन घटनाक्रमों पर नजर रखते हैं—यह न्यायिक स्वतंत्रता और ट्रिब्यूनल की प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन का मामला है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला यह तय करेगा कि क्या NCLT अध्यक्ष एक केंद्रीय समन्वयक के रूप में कार्य करेंगे जो सिस्टम को सुचारू बनाए रखे, या उनकी प्रशासनिक शक्तियां बेंचों के भूगोल तक ही सीमित रहेंगी। जैसे-जैसे शीर्ष अदालत इन तर्कों पर विचार कर रही है, उच्च-मूल्य वाले कॉर्पोरेट खातों की दिवाला समाधान प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है।

द्वारा अनन्या अय्यर
वैश्विक मामले संवाददाता

अनन्या अय्यर पॉलिटिकलपीडिया के लिए भारतीय दृष्टिकोण से वैश्विक मामलों को कवर करती हैं।