प्रशासनिक गतिरोध: उत्तर प्रदेश में राजस्व निरीक्षक के 1,000 पद खाली, ठप पड़ी व्यवस्था
यूपी में राजस्व निरीक्षक के 1000 पदों पर लटकी पदोन्नति
नौकरशाही की बाधाओं और प्रक्रियात्मक देरी के कारण राजस्व निरीक्षकों की पदोन्नति अनिश्चित काल के लिए लटक गई है, जिससे जमीनी स्तर के हजारों पद खाली पड़े हैं।
उत्तर प्रदेश के राजस्व विभाग के गलियारों में एक बड़ा प्रशासनिक गतिरोध चुपचाप जमीनी स्तर के कामकाज को प्रभावित कर रहा है। जहां एक ओर राज्य सरकार डिजिटल भूमि रिकॉर्ड और संपत्ति विवादों के त्वरित समाधान पर जोर दे रही है, वहीं दूसरी ओर इन कार्यों को धरातल पर उतारने वाली मशीनरी संघर्ष कर रही है। वर्तमान में, राजस्व निरीक्षक (RI) के 1,000 पदों पर पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी तरह से ठप है, जिससे सैकड़ों लेखपाल अपनी अगली पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं और फील्ड सुपरविजन में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है।
देरी की कीमत
राजस्व निरीक्षक, लेखपाल और उच्च-स्तरीय तहसीलदार कार्यालय के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। भूमि म्यूटेशन के सत्यापन से लेकर फसल सर्वेक्षण और आपदा राहत आकलन तक, उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। जब पदोन्नति में देरी के कारण ऐसे 1,000 पद खाली रहते हैं, तो मौजूदा कर्मचारियों पर काम का बोझ असहनीय हो जाता है। इसका सीधा असर नागरिकों पर पड़ता है, जिन्हें बुनियादी राजस्व संबंधी मंजूरी के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता है।
नौकरशाही की बाधाएं
यह देरी लंबित वरिष्ठता सूची और विभाग के भीतर प्रक्रियात्मक उलझनों के कारण हो रही है। हालांकि विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की नियमित बैठकें अनिवार्य हैं, लेकिन फाइलों की गति बेहद धीमी है। प्रशासन के सूत्रों का कहना है कि पात्रता सूचियों में तकनीकी विसंगतियां और प्रशासनिक बैकलॉग को दूर करने में तत्परता की कमी इसके मुख्य कारण हैं। वर्षों से सेवा दे रहे लेखपालों के लिए इसका मतलब है कि उनकी करियर प्रगति उन फाइलों में उलझी हुई है, जो अभी तक सचिवालय से कार्यान्वयन स्तर तक नहीं पहुंच पाई हैं।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
यह केवल सेवा नियमों का मामला नहीं है; यह उत्तर प्रदेश में स्थानीय शासन को प्रभावित करने वाली प्रशासनिक चुनौतियों का संकेत है। जब फील्ड-स्तरीय पर्यवेक्षी पद खाली रहते हैं, तो भूमि प्रशासन के लिए निगरानी तंत्र—जो अक्सर भ्रष्टाचार और मुकदमों का केंद्र होता है—काफी कमजोर हो जाता है। बड़ी तस्वीर यह है कि जब तक DPC प्रक्रिया में व्यवस्थित सुधार नहीं होता, नीतिगत घोषणाओं और जमीनी क्रियान्वयन के बीच की खाई बढ़ती जाएगी। यदि राज्य अपने राजस्व रिकॉर्ड में पारदर्शिता लाना चाहता है, तो इन पर्यवेक्षी रिक्तियों को भरना अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि प्रशासनिक आवश्यकता है।
राज्य सरकार पर अब कर्मचारी संघों का दबाव बढ़ रहा है कि वे इस प्रक्रिया में तेजी लाएं। क्या प्रशासन इन प्रक्रियात्मक बाधाओं को दूर कर 1,000 पदों को भर पाएगा, यह आने वाली तिमाही में राजस्व विभाग के लिए सबसे बड़ा सवाल है।
प्रिया नायर पॉलिटिकलपीडिया के लिए दलों, चुनावों और सत्ता की राजनीति को कवर करती हैं।