आधी रात की एक कॉल बनी त्रासदी: टिहरी गढ़वाल में दलित युवक की पीट-पीटकर हत्या
टिहरी गढ़वाल में अंतर-जातीय मित्रता के चलते दलित किशोर की पीट-पीटकर हत्या

पड़ोसी गांव में एक दोस्त से मिलने की 18 वर्षीय युवक की कोशिश तब जानलेवा साबित हुई, जब उसे एक कमरे में बंद कर लड़की के परिवार वालों ने बेरहमी से पीटा।
उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के खोलगढ़ गांव की शांति 7 जून, 2026 की रात उस समय भंग हो गई, जब देर रात की एक सामान्य मुलाकात एक जघन्य अपराध में बदल गई। देवल गांव के 18 वर्षीय दलित युवक केतन लाल की पिछले छह महीनों से एक उच्च जाति के परिवार की नाबालिग लड़की से दोस्ती थी। मोबाइल फोन के जरिए बनी यह दोस्ती उसे एक ऐसे जाल में ले गई, जिसकी कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
पुलिस के अनुसार, रविवार रात करीब 11 बजे लड़की ने केतन को फोन कर अपने घर बुलाया। अपने दोस्त दिवाकर डिमरी के साथ केतन गांव पहुंचा, उसे लगा कि वह लड़की से मिलने जा रहा है। लेकिन वहां उनका सामना हिंसा से हुआ। आरोप है कि लड़की के परिवार के सदस्यों ने दोनों युवकों को एक कमरे में बंद कर दिया और लाठियों से बेरहमी से उनकी पिटाई की।
हमले की क्रूरता का पता अगली सुबह चला। लड़की के पिता ने केतन के पिता धनपाल लाल से संपर्क किया और उनसे अपने बेटे को ले जाने के लिए कहा। जब धनपाल वहां पहुंचे, तो उन्होंने केतन को खून से लथपथ पाया। चौंड लंबगांव के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाने के बावजूद, किशोर ने दम तोड़ दिया। उसके साथ गया दोस्त दिवाकर डिमरी बौराड़ी के जिला अस्पताल में भर्ती है, जहां उसका गंभीर चोटों का इलाज चल रहा है।
कानूनी कार्रवाई और स्थानीय आक्रोश
इस घटना ने क्षेत्र में तनाव पैदा कर दिया है। आक्रोशित ग्रामीणों और पीड़ित परिवार ने अस्पताल से शव लेने से इनकार कर दिया और त्वरित न्याय की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रशासन ने स्थिति को संभालने के लिए कदम उठाए हैं। टिहरी गढ़वाल की वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्वेता चौबे ने पुष्टि की है कि हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया है।
अधिकारियों ने SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) लागू की है, जो हिंसा के जातिगत स्वरूप को स्वीकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सोमवार तक, पुलिस ने पूछताछ के लिए यशवीर सिंह पंवार नामक एक संदिग्ध को हिरासत में लिया है, जबकि परिवार के अन्य सदस्यों की भूमिका की जांच जारी है।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है: एक पुरानी और गहरी समस्या
पहाड़ों में हुई यह त्रासदी भारत की एक कड़वी और निरंतर सच्चाई को दर्शाती है: अंतर-जातीय सामाजिक सीमाओं की हिंसक पहरेदारी। जहां हिन्दुस्तान टाइम्स और अन्य समाचार माध्यमों की सुर्खियां हमें याद दिलाती हैं कि देश बुनियादी ढांचे के विकास से लेकर कानून-व्यवस्था के संकट तक, विभिन्न चुनौतियों से जूझ रहा है, वहीं एक दलित युवक की दोस्ती के कारण हुई हत्या सामाजिक प्रगति की नाजुकता को उजागर करती है।
जब व्यक्तिगत रिश्तों का जवाब जानलेवा हिंसा से दिया जाता है, तो यह संकेत मिलता है कि जातिगत पूर्वाग्रह अभी भी गहराई से जड़े हुए हैं और ग्रामीण इलाकों में वे खुद कानून बनकर काम कर रहे हैं। यह घटना एक अधिक प्रभावी सामाजिक हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है, क्योंकि केवल कानूनी ढांचे अक्सर पारंपरिक पदानुक्रमों के हिंसक प्रवर्तन को रोकने में संघर्ष करते हैं।
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